Thursday, May 12, 2016

दूसरों से अपेक्षा ना करें इससे दुःख मिलता है !!!

      


इंसान की फ़िक़रत है, कि वह सुख, सुविधा, सुरक्षा,  प्रेम व सम्मान की हमेशा दुसरो से अपेक्षा करता है। चाहता है दूसरे उसे समझें उसको अहमियत दें ,उसका साथ दें  उसे समय दें । पर वह खुद किसी को कुछ नही देना चाहता।किसी के लिए कुछ नही करना चाहता । खुद कभी किसी की उम्मीदों  के बारे में नहीं सोचता किसी की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश नहीं करता। अपने अंदर झाकने की कोशिस नही करता। कि में  क्या कर रहा हूं ? और हमेशा दुसरो से अपेक्षा रखता है। जब अपेक्षित उत्तर नही मिलता तब निराशा गुस्सा चिड़चिड़ापन आदि से ग्रस्त हो जाता है । अपेक्षा पुरी करने के लिए इंसान ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिस करता है। और जाने अनजाने मे सही गलत का फर्क करना भूल जाता है ।  और कोई ना कोई मिस्टेक कर बैठता है । सेक्सपियर ने कहा है- 

 " अधिकतर लोगो के दिलो में दर्द व रिश्ते खराब होने का कारण दुसरो से अपेक्षा ही  है" 
  
ये तय करो कि आप क्या चाहते हो ?:-दरअसल हमारे सामने सबसे बड़ी प्रॉब्लम ही ये है,  हम ये ही नही समझ पाते कि हम क्या चाहते हैं? अगर हम ये जान ले, की हमे क्या चाहिए? तो इससे हमारी क्षणिक व वास्तविक इच्छा का पता चल जाए। इससे हमारी काफी हद तक प्रॉब्लम सौलभ हो जाए । अगर क्षणिक  इच्छा है तो छोड़ देंगे । अगर वास्तविक इच्छा है तो इंसान उसे पूरा करने के लिए चोटी से एड़ी तक की जान लगा देगा,  वास्तविक इच्छा है तो आप उस इच्छा को पूरा करने के लिए अपना सब कुछ दाव पर लगा देंगे । रॉबिन शर्मा का एक लेख पढ़ा था अपनी नाव जला दो में इससे पूरी तरह सहमत हूं जब तक इंसान अपने लिए बचाव का ऑप्शन रखेगा तब तक कामयाबी की उच्चाई का रस नहीं चख पाएगा । और जब आप अपने बचाव के  लिए कोई ऑप्शन ही नहीं रखोगे तो आपके लिए कोई रास्ता ही नहीं बचेगा फिर करोगे या मरोगे । मरणा कोई नहीं चाहेगा तो फिर इंसान करेगा ही । हाँ सिर्फ आप को सघर्श ज्यादा करना पड़  सकता है। सघर्श से क्या घबराना ?  

आप की अपेक्षाएं लोगो को नही बदल सकतीं :-  रिस्ते तभी बिगड़ते  है जब अपेक्षाएं पूरी नही होती । हम परफेक्ट कैरियर , परफेक्ट लाइफ, परफेक्ट रिलेसनशिप को लेकर  इतने आसक्त हो जाते हैं कि ये आसक्ति ही हमारे लिए अभिशाप बन जाती है। खुशहाल लम्हे भी बोझिल बन जाते हैं । हम ये भुल जाते हैं कि हर इंसान में गुण के साथ साथ कोई ना कोई कमी भी अवश्य होती है। तुलसी कृत रामायण में भी आया है  -

इस संसार में ऐसा कौन ज्ञानी है, तपस्वी ,शूरवीर कवि विद्धवान और गुणों का धाम है जिसकी लोभ ने मिटटी पलीत ना की हो ?  लक्ष्मी  के मद ने किसको टेढ़ा और प्रभुता ने किसको बहरा नहीं कर  दिया ? ऐसा कौन है ,जिसे मृग नयनी ( युवती  स्त्री ) के  नेत्र बाण न लगे हो ?   (रज तम आदि) गुणों का सन्निपात किसे नहीं हुआ ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मद ने अछूता छोड़ा हो । यौवन के ज्वर ने किसे आप से बाहर नहीं किया ? ममता ने किसके यश का  नाश नहीं किया ? शोक रूपी पवन ने किसे नहीं हिला दिया ? चिन्ता रूपी सांप ने किसे नही डंसा ? जगत में ऐसा कौन  है जिसे माया ना व्यापी हो ।  मनोरथ कीड़ा है शरीर लकड़ी है । ऐसा धैर्य वान कौन है जिसके शरीर में ये कीड़ा ना लगा हो ? पुत्र की , धन की , लोकप्रतिष्ठा की इन तीन इच्छाओं ने किसकी बुद्धि को मलिन नहीं किया ( बिगाड़ नहीं दिया ) ?  

तो आप ही बताईये की कोई भी इंसान परफेक्ट कैसे हो सकता है ? जब हम खुद परफेक्ट नहीं हैं तो हम औरो उम्मीद कैसे कर सकते हैं ? खुश रहने का एक ही तरीका है की आप सच्चाई को स्वीकारें व दुसरो से अपेक्षाएं ना रखें। जो भी तुम करना चाहते हो अपने बल पर करें। दुसरों से मदद की उम्मीद ना करें और अगर आपकी कोई मदद भी करता है तो उसके शुक्रगुजार बनें 
  
इंसान की फ़िक़रत है कि वह हमेशा दुसरो को सुखी व खुद को दुखी मानता है :-लेकिन हम ये नही सोचते की दुसरा सुखी क्यु  है ? हम दुखी क्यु हैं ? हमे सोचना चाहिए! कि  हम अपने काम को कैसे कर रहे हैं ? बेहतर तरीके से कैसे कर सकते हैं ? हमारी सोच ही कामयाबी की तरफ लेकर जायेगी । हर इंसान काम की तो बात करता है लेकिन काम किस तरीके से किया जाएं ये जानना जरूरी है। नही तो कोल्हू के बैल की तरह चौरासी कोस चलकर भी वही खड़े रह जाएंगे । काम तो होगा जिंदगी भी चलती रहेगी पर वो गुणवत्ता नही आएगी जो आनी चाहिए। किसी भी कार्य में तभी कामयाबी मिलती है जब उसे वैज्ञानिक तरीके से किया जाएं। चाहे वो छोटे से छोटा काम हो या कोई बड़ा प्रॉजेक्ट। जब कोई काम तरीके से करते हैं  तो काम में गुणवत्ता के साथ साथ आनंद भी आने लगता है । 

   " प्रत्येक दिन एक  "अपेक्षा" के साथ शुरू होता है और एक अनुभव के साथ खत्म होता है "

समस्या से भागने की बजाए समस्या की जड़ को समझें :-जे. कृष्णमूर्ति का कहना है कि-
 " समस्या को समझ कर ही हम उसे मिटाने का प्रयास कर सकते हैं दवाब से कभी भी जीवन में बदलाव नही आ सकता"  

असफल हो तो आप उसे सफलता के नकाब से नही बदल सकते । उसे आप तभी बदल सकते हो जब आप अपने अंतर्मन से सवाल करो कि आप असफल क्यों हो ? उस समस्या को जानकर ही समाधान कर  सकते हो ।बाजीराव मस्तानी फिल्म  में कहा गया था कि  जड़ों पर वार किया जाए तो बड़े पेड़ को गिराया जा सकता है । जैसे जड़ पकड़ने से पूरा पेड़ काबू में आ जाता है। उसी तरह से अगर हम किसी समस्या की जड़ पकड़ ले तो उस का हल आसानी से निकल आता है ।  

दूसरों को देने से बढ़कर और कोई ख़ुशी नहीं है :-   दूसरों को देकर जो ख़ुशी मिलती है वो किसी से लेकर कभी नहीं मिल सकती । जब हम किसी को कुछ देते हैं तो हमे महसूस होता है की प्रभु की दया द्रष्टि हम पर  है । हम स्वार्थी होने की बजाए निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं । जो दूसरों की निस्वार्थ मदद करते हैं उन्होंने पाया होगा कि देने से कभी भी घाटा नही होता बल्कि दिन प्रति दिन जीवन में खुशहाली ही बढ़ती जाती है । अपने लिए भी रस्ते खुलते जाते हैं । तभी तो किसी ने कहा है -

 कुछ भी मांगना अच्छा नहीं लगता,कही हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता । भगवान मुझे देने वालो की, कतार में रखना तेरे दर के सिवा सर झुकाना अच्छा नहीं लगता ।   


यदि आप कामयाबी चाहते हो तो दुसरो से अपेक्षा करने की बजाए खुद से अपेक्षा रखें । खुद मेहनत करें बिना मेहनत और लगन के इंसान किसी भी फिल्ड में कामयाबी हासिल नहीं कर सकता । किसी ने सही कहा है कि -

     " कोशिस कर,  हल निकलेगा। आज नहीं तो, कल निकलेगा। 
       अर्जुन के तीर सा निशाना साध, जमीन से भी जल निकलेगा ।
       मेहनत  कर पौधों को जल दे ,बंजर जमीन से भी फल निकलेगा । 
         ताकत जुटा हिम्म्त को आग दे, फौलाद का भी बल निकलेगा ।
       जिंदा रख दिल में उम्मीदों को , समंदर से भी गंगा जल निकलेगा । 
     कोशिस जारी रख कुछ कर गुजरने की, जो है आज थमा थमा वो चल निकलेगा"    

Friday, April 22, 2016

धार्मिक कार्य क्रम होने क्यों जरूरी है ? ( शास्त्रों का अध्यन क्यों जरूरी है )

               

                                    धार्मिक कार्य क्रम  होने  क्यों जरूरी है ? ( शास्त्रों का अध्यन क्यों जरूरी है )


कलियुग के पापों ने सब  धर्मो को ग्रस लिया है ,सद्ग्रन्थ लुप्त हो गए है  ,दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर करके बहुत से पथ प्रकट कर दिये है। सभी लोग मोह के वश हो गये है  ,शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया है। कलियुग में न वर्ण धर्म रहता है , न  चारो आश्रम रहते  हैं । सब स्त्री पुरुष वेद के विरोध में लगे रहते हैं । ब्राह्मण वेदो को बेचने वाले और राजा प्रजा को खा जाने वाले होते हैं । शास्त्रों के अनुसार  कोई नहीं चलता  जिसको जो अच्छा लगता है वही मार्ग है जो डींग मरता है वही पड़ित है । जो मिथ्या रचता है और  दम्भ में रहता है उसी को सब संत मान लेते हैं । जो दुसरों का धन हरण कर ले , वही बुद्धिमान है जो झूठ बोलता और हंसी व दिललगी करना जानता है कलुयग में वही गुणवान कहा जाता है । जो वेदमार्ग को छोडे हुए  हैं वही ज्ञानी है ।  सच्चे को सच्च साबित करना पड़ता है । झूठे का बोलबाला है । जो अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य या  अभक्ष्य सब कुछ खाते है वह योगी हैं वही कलियुग में पूज्य हैं । जो झूठ बोलने वाले हैं वे वक्ता है। सभी  पुरुष स्त्रीयों के वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह नाचते हैं । ब्राह्मणों को शुद्र उपदेश करते हैं । गले में जनेऊ डालकर कुलसित दान लेते हैं । गुरु शिष्यों का धन हरण करते है और माँ बाप वही धर्म सीखाते हैं जिससे पेट भरें । स्त्री पुरुष ब्रह्म ज्ञान  की बाते  करते है पर लोभ वश कोड़ियो के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं । तेली, कुम्हार चांडाल, भील, कोल आदि जो वर्ण में नीचे हैं स्त्री के मरने पर या सम्पति नष्ट होने पर सन्यासी बन जाते  हैं और ब्राह्मणो  से पैर पुजवाते हैं । ब्राह्मण लोभी, कामी, और नीच जाती की व्यभिचारणी स्त्रियों  के स्वामी होते है । कलुयग में सब लोग वर्ण संकर और मर्यादा से च्युत हो गए हैं । और दुख भय रोग शोक और वियोग पाते हैं । वेदसममत तथा वैराग्य और ज्ञान न युक्त जो हरि भक्ति का मार्ग है मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेको नये नये पंथो की रचना करते हैं । सन्यासी बहुत धन लगा कर  घर सजाते हैं । उनमे वैराग्य नही रहा उसे विषयों ने हर लिया है तपस्वी धनवान हो गये है और गृहस्थ दरिद्र । मनुष्य जप तप यज्ञ  व्रत और दान तामसी  भाव से करते हैं।  मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते है ।  संतोष है न विवेक है और न शीतलता है । ईष्या कड़वे वचन और लालच भरपूर हो गए हैं समता चली गई है वियोग शौक से भरे पड़े हैं । इंद्रियों का दमन दान दया और समझदारी किसी में नहीं रही । मूर्खता और दूसरों को ठगना यह बहुत अधिक बढ़ गया है स्त्री पुरुष सभी पेट पालने में ही लगे हुए हैं । जो पराई निंदा करने वाले हैं जगत में वे ही फैले है । गलती चाहे किसी की भी हो उसे उसका कर्म फल जरूर भोगना पड़ता है ।   

लेकिन कलयुग में एक गुण है। सतयुग त्रेता और दुापर में जो गति पूजा यज्ञ और योग से प्राप्त होती है वही गति कलयुग में नाम  जप से  हैं ।  


जीव का कल्याण केवल भक्ति मार्ग से होता है और भक्ति की कोई उम्र नहीं होती जो प्रभु के नाम को जपता है उसे कोई परास्त नहीं कर  सकता । हजारो मुसीबत आने पर भी भगवान का ध्यान व भजन नहीं छोड़ना चहिए। भगवान नाम सुनने से या लेने से जीव पवित्र हो जाता है । 

जहां हवन यज्ञ नहीं होते वहां देवता रुष्ट हो जाते हैं वहां सिर्फ अनहोनी ही होती हैं, जहां देवताओं का सम्मान नहीं होता वे  उस जगह को छोड़ कर हमेशा के लिए चले जाते हैं " 


इंसान की दो जिम्मेदारी   हैं  एक  घर  और  दुसरी   समाज  की :-  घर की जिम्मेदारी तो हर इंसान पूरी कर लेता  है। लेकिन समाज की जिम्मेदारी को पूरा करने की जरूरत पड़ती है । जैसे बबूल का पेड़ अपने आप बड़ा हो जाता है, लेकिन गुलाब के पेड़ को खाद पानी व निराई  समय समय पर देनी पड़ती है। लेकिन ये देखो की बबूल के  पेड़ से सिर्फ काटे मिलते हैं । लेकिन अच्छाईयों और सामाजिक कार्यो से इंसान का व्यक्तित्व विकसित होता है उसी से भविष्य में सफलता मिलती है । 

 संस्कृति को बचाना हमारा कर्तव्य  है और इसे निभाना जरूरी  हैं ?:- आज इंसान इतना सेलफिश हो चुका है की वह खुद से अधिक सोचता ही नहीं है। धन के पीछे इतना भाग रहा है कि उसे कुछ और दिखाई ही नहीं देता। धन कमाने की ही शिक्षा बच्चों को दे रहा है । संस्कार सभ्यता संस्कृति  जैसी बहुमूल्य रीतियों को  भूल गया है। जब खुद ही इन बातो को भूल गया है तो बच्चों को क्या सिखाएगा ? जब आप खुद ही  घर परिवार समाज में मिलकर नहीं चलते, आपको ही किसी की परवाह नहीं है, आप के बच्चों  को किस की परवाह होगी ? कल आप के बच्चे आप से अधिक लापरवाह और गैर जिम्मेदार होंगे।  जब आज आप अपने पैरेंट्स परिवार व समाज की परवाह नहीं करते तो कल ये भी आप की परवाह नहीं करेंगे । बच्चों के  लिए धन जोड़ने से ज्यादा संस्कार डालने की कोशिस करो तभी आप लाइफ में खुश रह सकोगे । कहते हैं कि -
 गीता भागवत में भगवान श्री कृष्ण ने बहुत अच्छी बात कही  है -
    "     जीवन के उद्धार लिए केवल मित्र ,प्रेम और परिवार चाहिए "  

अब आप ही बताइये की क्या आपने मित्र ,प्रेम और परिवार को अहमियत दी  है ? नहीं आप का ध्यान रहा है सिर्फ पैसे कमाने पर या मैक्सिमम अपने बच्चों पर लाइफ पाटनर पर।  जब आप अपनी संस्कृति  ही  भूल गए हैं, तो  क्या  कल आप के  बच्चे किसी की परवाह करेंगे?  क्या वो आपको  पूछेंगे ? कल वो अपने भाई बहनो का साथ देंगे ? नहीं जो आप कर रहे हो वो आप से सीख रहें हैं ।    

शस्त्रों का पाठ  क्यों जरूरी हैं :- आप ये जानते ही हो की आज रामायण, भागवत जैसे शास्त्रों के पाठ घरों में बहुत कम लोग करते है। जो लोग खुद इन्हे नहीं पढ़ते, अपने जीवन में उन्हें नहीं उतारते वो अपने बच्चों को क्या सिखाएंगे? अगर उन्हें पढ़ने के लिए कहा  जाए तो एक ही बात सुनने को मिलेगी मुझे तो उसकी सारी कहानीयां  याद हैं। कहानी तो आप जितनी बार पढोगे वो ही मिलेगी।  लेकिन जो उनमे शिक्षा मिलती वो याद नहीं रहती, जो मानव की मर्यादा बताई गई है वो याद नहीं रहती,  जो असुल जीवन मे बताए हैं वो  नहीं याद रहते इसके लिए जरूरी हैं की हम बार बार इन्हे पढ़े, ऐसे प्रोग्राम करवाए जिससे बच्चों में ये संस्कार आएं। अगर हम बच्चों को सिर्फ इन्हे सुनाए तो बच्चे बोर होंगे ये प्रोग्राम रोचक  लगते है इसलिए बच्चे इंजॉय के साथ साथ इनमे दिए आदेश को भी मानते हैं। इसीलिए हमारे बुजर्गो ने रामलीला कृष्ण कथा करवाने का सिलसिला शुरू किया था ।  ये हमे सीखते हैं कामयाब कैसे बनें, रिस्ते कैसे निभाएं, दोस्ती कैसे निभाएं,सही व गलत की पहचान कैसे करें , हमारे उसूल क्या होने चाहिए, कौन सी गलत  आदत हमे लाइफ मे सक्सेस रूप से जीना सिखाती है ये सिखाती है जिंदगी में कौन सी गलत आदतें इंसान को बर्बाद कर  देती हैं आदि । आज ये कार्य क्रम कम हो गए हैं जिसकी वजह से बच्चों में संस्कारो की कमी, सभ्यता की कमी,सहनशीलता की कमी, चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है  ।  मनुष्य के उद्धार के लिए शास्त्रों की पूजा पाठ जरूरी है। 
    



Friday, April 8, 2016

नफरत दिलो को जलाती है इससे बचें!!!

    नफरत दिलो को जलाती है इससे बचें!!!




जैसे आग सब कुछ जलाकर नष्ट कर देती है] उसी तरह से नफरत भी सब कुछ जलाकर खाक कर देती है।जो लोग दुसरों से नफरत करते हैं वो लोग अपने दुश्मन को अपने जीवन का सुख चैन छीनने का अवसर प्रदान करते हैं। नफरत कई बिमारियों को जन्म देती है। मानसिक व बलडप्रेशर जैसी बीमारियों तो मुख्य कारण ही नफरत है। नफरत करने वाले इंसान समय से पहले बुढ्ढे दिखाई देने लगते हैं। और प्रेम दया भाव रखने वाला इंसान हमेशा युवा दिखाई देता है। शेक्सपियर का कहना है कि

   +]] नफरत की भट्टी को इतना तेज मत करो] कि तुम भी उसी आग में जलकर राख हो जाओ ]] 

डेल कार्नेगी ने लिखा है कि & 

 ]]नफरत को भूलने के लिए किसी ऐसे कार्य में जुट जाए जो आपकी कैपेबिलिटी से  बहुत बड़ा हो]] 
            ---- विचार 


ऐसा करने से इंसान अपने अपमान और शत्रुता की प्रवाह नहीं करेगा । क्यों कि उसे अपने विशाल लक्ष्य के आलावा कुछ और दिखाई ही नही देगा। और वह नफरत की भट्टी से बच जाएगा। इंसान के पास नफरत की भट्टी से बचने का एक ही उपाय है की वह इससे दुर रहे। नहीं तो नफरत की भट्टी आपको अपनी तरफ दुर से भी ऐसे खींच लेगी जैसे चुंबक लोहे को अपनी तरफ खींच लेता है। तभी तो कहते हैं कि एक नफरत ही है जिसे दुनिया चंद लम्हों में जान लेती हैं वरना चाहत का यकीन दिलाने मे जिंदगी बीत जाती है । 
  
]]अगर लोग आप से नफरत करते हैं तो इस की दो वजह हो सकती हैं aआप में ऐसा कुछ है जिसे वो पसंद नहीं करते या आप में कुछ ऐसा है जो उनमे नहीं है]] 
                  -----विचार 
नफरत  करने वाला इंसान एक दिन खुद ही गलत साबित हो जाता है । और हार कर एक दिन उसे खुद ही समझौता करना पड़ता है। और जब तक इतनी देर हो चुकी होती है की जहां उसे होना चाहिए वो जगह उसे कभी नहीं मिल पाती। क्यों की जब तक और लोग जुड़ चुके होते है और उस इंसान पर विश्वास भी नहीं किया नहीं जा सकता जिसने पहले लालच में धोखा दिया हो । जीवन में सुख शांति चाहने वाले इंसान को हमेशा ही शत्रु को माफ़ कर देना चाहिए। उनके बारे मे एक भी नेगेटिव विचार न आने देना चाहिए। इससे सिर्फ अपनी ऊर्जा और समय ही नष्ट होता है। सही कहा है किसी ने मेरे पास वक्त नहीं है नफरत करने का उन लोगो से जो मुझसे नफरत करते हैं क्यों की में व्यस्त हुं उन लोगो मे जो मुझ से प्यार करते हैं। और ये भी किसी ने खूब ही कहा है कि प्यार एक ऐसी चीज है जो इंसान को गिरने नहीं देती और नफरत ऐसी चीज है जो इंसान को आगे बढ़ने नहीं देती।    

]]जब लोग किसी को पसंद करते है तो उसकी बुराइयां भूल जाते हैं और जब किसी से नफरत करते हैं तो अच्छाइयां भूल जाते हैं]] 

]]यदि इंसान बेपनहा मोहब्त कर  सकता है तो नफरत भी कर सकता है क्यों की जब एक खूब सूरत आइना टूटता है तो वह एक हथियार बन जाता है]]  
     --विचार 


इसलिए सब से प्यार करो क्यों की इंसान प्यार से आगे बढ़ सकता । प्यार से ही जीवन मे सुख शांति से रहने की शक्ति मिलती है। जो लोग आप से नफरत भी करते हैं उन लोगो से भी नफरत मत करो क्यों की वो लोग आपको अपने से बेहतर मानते हैं। और खुद को कम आंकते है यही सोच उनकी ईर्ष्या का कारण बनती है। वैसे शत्रु आपके बहार नहीं है असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं वो शत्रु हैं क्रोध घमंड लालच आसक्ति और नफरत। अंदर के दुशमनो ने बहार भी दुश्मन बना दिए हैं और जब तक आप अंदर के दुशमनो को नहीं जीतोगे तब तक आप बहारी  दुश्मनो को भी नहीं जीत सकते । हमारी छोटी सी जिंदगी है जो मेरे हिसाब से तो प्यार के लिए ही कम है इसे नफरत जैसी बेकार की बातों में क्यों बिताए \  हाँ जिंदगी में नाटक मत करो जो हकीकत में वही रहो। दिखावा मत करो इससे गिड़गि बोझ बन जाएगी।  

]]प्यार का नाटक करने वालो से तो नफरत करने वाले अच्छे है कम कम से कम ईमानदारी से तो करते हैं]] 
                        ---विचार 

वरना ऐसे भी बहुत लोग होते है हमारी जिंदगी में जो ऊपर से भले बनते हैं और अंदर ही अंदर हमारी कामयाबियों और सुख शांति से जलते हैं। और हम जानकर भी उन्हें कुछ नहीं कह पाते । कम कम से डबल फेस तो नहीं हैं वरना ऐसे लोगो से तो सावधान रहना भी मुश्किल है। इसलिए जियो और जीने दो। कबीर जी का एक दोहा मेरे दिल के बहुत करीब रहता है 
   
 ]]जब हम आए जगत  मे जगत हँसा हम रोएं] ऐसी करनी ना करें जग हसे हम रोए]]  

सक्सेस से भी ज्यादा जरूरी है सटिस्फेक्सन

  सक्सेस से भी ज्यादा जरूरी है सटिस्फेक्सन 

     "सक्सेस और सैलरी आकिस्मक होते हैं ,उन पर ध्यान देने की बजाए अपने मन की सुनना चाहिए "
                               -अंकुर तुलस्यान (प्रोडकट मैनेजर हेंकेल )



आज हम बहुत प्रोग्रेस कर  चुके हैं। परंतु क्या हम सटीस्फाई हैं ? नहीं है आज हम एक कठ पुतली  की तरह बन  गए हैं । जैसे कठ पुतली को लोग नचाते  हैं । ऐसे ही हमारी सुख सुविधा की भूख ने हमे नचा रखा है हमे हमारी इच्छाएं नचा रही हैं और हम नाचे जा रहे हैं । अच्छा घर. गाड़ी, बैक बैलेंस सब कुछ होते हुए भी और और की भूख ने हमे भिखारी बना दिया है। और हम इतने बड़े भिखारी बन चुके हैं कि चाहे हम कितना ही कमा लें  हमारा अपना ही पेट नहीं भरता । आज के अधिकतर लोग सिर्फ लेना जानते हैं मदद करना तो भूलते जा रहे हैं। याद करिए,  की आप ने कितने दिनों से किसी की कोई मदद नहीं की ? इंसान की फिकरत होनी चाहिए की अगर उसे दो रोटी मिल रही हैं तो डेड खाएं और आधी रोटी उन जरूरत मंदो को दे जो भूखे ही सो जाते है। ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हे हमारी और आपकी मदद की जरूरत है । अपनी भूख को इतना ना बढ़ाए की दूसरों की भी छीन लें,  जो आज  हो  रहा है । यही सबसे पहला कारण है अपराध बढ़ने का ।        



परमात्मा ने सबसे सुंदर रचना मानव जीवन की है।  क्या वो  इसलिए की है कि मानव अपने लिए जिए और अपने लिए मर जाए ? तो फिर मानव और पशु पक्षियों में क्या फर्क है ? बच्चे तो ये भी पैदा करते हैं, पेट ये भी भरते हैं, घोंसला ये भी बनाते हैं,  फिर मानव जीवन की जरूरत ही क्या ? मानव पेट भरता है अपना और अपनों का, घर बनाता है अपने लिए और अपनों के लिए, धन जोड़ता है अपने और अपनों के लिए  फिर "मै" किस चीज की ?  ये काम तो पशु पक्षी सभी कर रहे हैं । फिर आप अलग क्या कर  रहे हो ?   देखो दोस्तों आप इस दुनिया में  किस लिए आए हो मुझे नहीं पता पर मुझे इतना  पता है की भगवान ने मानव जीवन की रचना इसलिए तो नहीं की होगी की खुद के लिए जिए और खुद  जाएं । भगवान ने मानव जीवन की रचना इसलिए की होगी की उस की स्रष्टि को और भी सुंदर बनाया जा सके ।   


 क्या हमारे बुजर्गो की लाइफ में इतनी टेंशन थी  जितनी अब है ?  नहीं पहले के  लोग मस्त थे उनके जीवन मे सादगी थी। वो थोड़े से संतुष्ट थे, एक दूसरे की मदद करते थे, उनके परसनल खर्चे कम थे । लेकिन आज हम लोगो ने अपने खर्चे इतने बड़ा लिए है  की  अब चाहे इंसान कितना ही कमा ले उनके खर्चे ही पुरे नहीं होते क्यों की आज का इंसान इच्छाओ के पीछे भागता है। हर इच्छा के पीछे मत भागो जो जरूरी है उसी को पूरा करो । 

इंसान की दो  जरूरते  हैं  एक  घर  और  दुसरी   समाज  की :-  घर की जरूरत तो हर इंसान पूरी करता ही है। लेकिन समाज की जरूरत को पूरा करने की जरूरत पड़ती है । जैसे बबूल का पेड़ अपने आप बड़ा हो जाता है, लेकिन गुलाब के पेड़ को खाद पानी व निराई  समय समय पर देनी पड़ती है। लेकिन ये देखो की बबूल के  पेड़ से सिर्फ काटे मिलते हैं । लेकिन अच्छाईयों और सामाजिक कार्यो से इंसान का व्यक्तित्व विकसित होता है उसी से भविष्य में सफलता मिलती है । 

 कर्तव्य निभाने  क्यों जरूरी  हैं ?:- आज इंसान इतना सेलफिश हो चुका है की वह खुद से अधिक सोचता ही नहीं है। धन के पीछे इतना भाग रहा है कि उसे कुछ और दिखाई ही नहीं देता। धन कमाने की ही शिक्षा बच्चों को दे रहा है । संस्कार सभ्यता संस्कृति  जैसी बहुमूल्य रीतियों को  भूल गया है। जब खुद ही इन बातो को भूल गया है तो बच्चों को क्या सिखाएगा ? जब आप खुद ही  घर परिवार समाज में मिलकर नहीं चलते, आपको ही किसी की परवाह नहीं है, आप के बच्चों  को किस की परवाह होगी ? कल आप के बच्चे आप से अधिक लापरवाह और गैर जिम्मेदार होंगे।  जब आज आप अपने पैरेंट्स परिवार व समाज की परवाह नहीं करते तो कल ये भी आप की परवाह नहीं करेंगे । बच्चों के  लिए धन जोड़ने से ज्यादा संस्कार डालने की कोशिस करो तभी आप लाइफ में खुश रह सकोगे । कहते हैं कि -

" पूत कपूत तो क्या धन संचय और पूत सपूत तो क्या धन संचय" 

 धन में ख़ुशी नहीं है । सपूत होगा तो कमा के खा लेगा और कपूत है तो  आपके कमाए  हुए को भी बर्बाद कर देगा । गीता भागवत में भगवान श्री कृष्ण ने बहुत अच्छी बात कही  है -
    "     जीवन के उद्धार लिए केवल मित्र ,प्रेम और परिवार चाहिए "  

अब आप ही बताइये की क्या आपने मित्र ,प्रेम और परिवार को अहमियत दी  है ? नहीं! आप का ध्यान रहा है सिर्फ पैसे कमाने पर या मैक्सिमम अपने बच्चों पर लाइफ पाटनर पर।  जब आप अपनी संस्कृति  ही  भूल गए हैं, तो  क्या  कल आप के  बच्चे संस्कृति सीखेंगे,  अपने भाई बहनो का साथ देंगे ? नहीं! जो आप कर रहे हो वो आप से सिख रहें हैं ।    

सस्कृतिक कार्य क्रम  क्यों जरूरी हैं :- आप ये जानते ही हो की आज धर्म शास्त्रों का लोप होता जा रहा है आज रामायण, भागवत जैसे शास्त्रों के पाठ घरों में बहुत कम लोग करते है। जो लोग खुद इन्हे नहीं पढ़ते, अपने जीवन में उन्हें नहीं उतारते वो अपने बच्चों को क्या सिखाएंगे? अगर उन्हें पढ़ने के लिए कहा  जाए तो एक ही बात सुनने को मिलेगी मुझे तो उसकी सारी कहानीयां  याद हैं। कहानी तो आप जितनी बार पढोगे वो ही मिलेगी।  लेकिन जो उनमे शिक्षा मिलती वो याद नहीं रहती, जो मानव की मर्यादा बताई गई है वो याद नहीं रहती,  जो असुल जीवन मे बताए हैं वो  नहीं याद रहते इसके लिए जरूरी हैं की हम बार बार इन्हे पढ़े, ऐसे प्रोग्राम करवाए जिससे बच्चों में ये संस्कार आएं। अगर हम बच्चों को सिर्फ इन्हे सुनाए तो बच्चे बोर होंगे ये प्रोग्राम रोचक  लगते है  इसलिए बच्चे इंजॉय के साथ साथ इनमे दिए आदेश को भी मानते हैं। इसीलिए हमारे बुजर्गो ने रामलीला कृष्ण कथा करवाने का सिलसिला शुरू किया था । आज ये कार्य क्रम कम हो गए  हैं जिसकी वजह से बच्चों में संस्कारो की कमी, सभ्यता की कमी,सहनशीलता की कमी, चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है  ।  
    
सस्कृतिक कार्य क्रम करने में समस्याएं क्या -२  आती हैं :-  में दिल्ली एनसीआर  मे रह रही हुँ मेरी जो पहली व बड़ी समस्या रही है वो ये है कि में जहां रह रही हूं में वहा की नहीं हुं। इसलिए जो लोग कुछ करने का जज्बा रखते हैं वो लोग जुड़े नहीं और जो जुड़े या जुड़ना चाहते है वो लोग निस्वार्थ नहीं जुड़ना चाहते। किसी को चार्ज चाहिए किसी को चौधराहट । और वो भी अगर दी जाये तो किस किस को एक को दे दुसरा नाराज।  क्या ये काम निस्वार्थ नहीं होने  चाहिए ? या जो चार्ज चाहते हैं वो सच में चार्ज योग्य है ?  जो अपनी जेब से  हजारो नहीं लगा सकता क्या उसे लाखों का चार्ज सोप सकते हैं ?

मेरी जो दुसरी समस्या रही है वो ये है कि जो समाज के ठेकेदार हैं वो भी मैने में और मेरी से ऊपर नहीं पाए । ये काम किए जाते है समाज को जोड़कर लेकिन कही  ना कही ये लोग ही में  और मेरी फैलाते  हैं। जहां हमे मिलकर ये कार्य करने चाहिए वही ये गांव वाले या बहार वालो में बाट देते हैं । हजारो इल्जाम लगा देते हैं नीयत पर शक करते हैं । हजारो से मदद मांगने पर मदद करने  के लिए एक दो ही  मुशिकल  से  आए लेकिन टांग अडाने के लिए लिए सैकड़ो तैयार। बिना जाने इल्जाम लगने के लिए तैयार।  कुछ से कुछ बात बनने के लिए तैयार अब आप ही बताईये  की ये कार्य कैसे करें ? किस किस को समझाएं ? किस किस के सामने सफाई दें ? और क्यु दें ? चोरी करी  है ?  जारी करी है ? ठगा है किसी को ?  अगर आप मदद के लिए आते हो चार्ज और चौधराहट के लिए ? पैसा हम अपना लगाएं, फिजिकली हम संभाले टाइम हम अपना लगाएं फिर आप कौन  होते हो टांग अडाने वाले  ?  जब आप हम पर बिना लगाए विश्वास नहीं करते तो  हम आप पर विश्वास कैसे करें ?   

तीसरी जो मेरी प्रॉबल्म रही है  वो है जगह की अगर हम  फार्म हाउस मे करते , तो बजट से ऊपर जाता है  और अगर किसी मंदिर या पचायती जगह पर करवाते हैं तो उनमे उनके ठेकेदार शर्त रख देते हैं । कभी किराया कभी चढ़ावा क्या ये उचित है ? अगर ऐसा है तो पहली ही बार में ये शर्त क्यों नहीं रखी गई ? अगर ये यहां की प्रोग्रेस का बहाना है तो क्या ये तरीका सही है ? क्या इससे वास्तव में प्रोग्रेस हुई ? सच में प्रोग्रेस का कोई और तरीका नहीं था ? क्या ये सिर्फ कुछ लोगो का घमंड और ईर्ष्या नहीं है ?

चौथी जो प्रॉबल्म सामने आई वो किसी के मरने से कोई मर गया तो ये कार्य मत करो इससे समाज वाले ऊगली उठाएंगे ! क्यों ?  क्यों उठाएंगे ? क्या उस दिन से मंदिर  के दरवाजे बंद हैं  ? क्या कोई और पुजा पाठ नहीं होते  ? क्या गांव मे और कार्य कर्म नहीं हुए ? दूसरे दिन ही कुआं पूजन भी हुए रिटायर मेन्ट की पार्टी भी दी गई फिर भगवान के नाम पर ही रोक क्यों ? क्या मैसिज दे रहे हो जनता को आप ? आप यहां के हो इसलिए अपनी चलाते हो ?  या बाहर के लोगो को नीचा दिखने के लिए ऐसा करते हो ?  अगर आपकी बहन बेटी की शादी होती तो  क्या आप रोकते ?  इसमें भी तो दो गरीब लड़कियों की शादी थी क्या वो किसी की बहन बेटी नहीं ?आप की ये हरकत समाज में भाई चारा बनाने का संदेश देता है या तोड़ने का ? जरा आप सोचिये । क्या हमे उसके के मरने का दुःख नही है क्या हमे ऐसे हालातो में करने का शौक है जहां हम खुद एंजॉय न कर पाएं ? नहीं शास्त्रों के  कुछ नियम हैं जिन्हे नहीं तोडा जाता डल के बाद तो घर  में भी अगर मौत  हो जाए तो भी मंदिर में जाकर ये कार्य पुरे किये जाते हैं । अगर बाप ने डल दी है और वो मर जाए तो बेटा  उसे पूरा करवायेगा । इसलिए इन कार्यों को अवॉइड नहीं किया जाता जैसे मेहमानों को बुलकर शादी पोस्फोन नहीं की जाती इसी तरह देवताओं को आंमत्रित कर के ये कार्य पोस्फोन नहीं किये जाते। इसमें किसी का हित नहीं है इसमें देवताओं का अपमान है। भागवत में आया है कि -      
जहां हवन यज्ञ नहीं होते वहां देवता रुष्ट हो जाते हैं वहां सिर्फ अनहोनी ही होती हैं, जहां देवताओं का सम्मान नहीं होता वे  उस जगह को छोड़ कर हमेशा के लिए चले जाते हैं " 

पांचवी प्रॉबल्म मेरी ये है कि ये कार्य कर्म जहां हो रहा है अगर हम वहां से हटकर कही अलग करते हैं तो लोगो को क्या जवाब दें की हम ये कार्य अलग जगह पर क्यों कर  रहें हैं ? कुछ लोग अपनी चलाने की कोशिस करते हैं इसलिए ? हम बहार के हैं इसलिए ? या कुछ लोगो की ईगो को ठेस पहुंचती है इसलिए ?  इस जगह कोई न्याय की कहने वाला नहीं है इस लिए ?  अगर ये ही सब बाते  हैं  और  हम एक शब्द भी बोलते हैं तो इससे यहां की जनता को नेगेटिव मैसिज ही जायेगा । ये कार्य समाज को जोड़ने के लिए किये जाते हैं लेकिन इससे टुटेगा । लोगो के दिल में सिर्फ नफरत बढ़ेगी ।   

इस समस्या का समाधान क्या है ?   सिर्फ एक जो समाज के जिम्मेदार नागरिक हैं वो अपनी जिम्मेदारी निभाएं। बाहर जाकर आप बहुत कुछ करते हो कुछ यहां पर भी सहयोग करें ।  इस पृथ्वी के तुम ऋणी हो इस का ऋण उतरो यहां ऐसा माहौल क्रेट करो जिससे की यहां पृथ्वी पवित्र हो । सहयोग अाप से इसलिए नहीं मांगा  की आपके पैसो की हमे जरूरत है इसलिए मांगा है ये काम सबका है । आप धन का सहयोग करें या ना करें ये आपकी मर्जी है लेकिन यहां इस कार्य को करने में सहयोग जरूर करें, यहां अनुशासन बनाएं रखने के लिए जरूर सहयोग करें, जो लोग में मेरी फैला रहे हैं इसे रोकने में सहयोग करें, भाई चारा बढ़ाने में सहयोग करें, आप के सहयोग से  ही ये कार्य हो सकते हैं । आप इसलिए भी मदद करें क्यों की आप यहां की समिति के मेंबर हैं आगे आप की मर्जी आप में मेरी से ऊपर उठकर इन शुभ कर्यो को अंजाम देते हो या बाकि सब की तरह भीड़ का हिस्सा बनकर खड़े तमाशा देखते  हो। हनुमानजी को मानो और राम कार्य में विघ्न डालों या समर्थ होते हुए विघ्न डालने दो तो हनुमान जी प्रशन होंगे  ? 

अच्छे पहलुओं को देखें :-  इस काम में अच्छे पहलुओं को देखें।  में और मेरी से ऊपर होकर  काम करने में शुरू  में दिक्क्त जरूर होगी।  लेकिन बाद में आदत पड़ जाएगी और एक बार आदत पड़ने पर आपकी लाइफ में कोई टेंशन ही नहीं रहेगी । फिर आप सही डिसीजन ले पाओगे ।  टेंशन सिर्फ इसलिए होती है क्योंकि हम आदत से मजबूर है, दूसरों में कमियां देखते हैं, नेगेटिव पहलू देखते हैं । अच्छे कार्यो में आगे बढ़ोगे तो आपकी  अच्छे कार्यो की आदत ही आपको नई दिशा देगी। अगर आप कोई अच्छा कार्य नहीं कर सकते या होते हुए कार्य में सहयोग नहीं दे सकते तो आप जिंदगी जीने के लायक ही नहीं हो। परेशान व अनिश्चित दुनिया में लोग बहुत महान कार्य कर रहे है  अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा दूसरों के सहयोग में लगाते है और  उन्हें  दूसरों का सहयोग मिलता  व परिवर्तन लाते  हैं । मुझे विश्वास है की  आप भीड़ का एक हिस्सा नहीं हो आप में कुछ अलग कर गुजरने की काबिलियत है बस उसे पहचानों।  आप की लाइफ का कोई मकसद है। जिसके लिए परमात्मा ने आप को भेजा  है। रॉबिन शर्मा ने लिखा है कि -
"आपके होने का मतलब है   समुदाय के लोगो की मदद कर उन्हें  ऊचाई पर ले जाना  या  फिर जिन्हे आपके  सहयोग  की  बेहद जरूरत है उनहे  मदद करना " ।                                          




Friday, March 11, 2016

आत्मनिर्भर बनना चाहते हो ? ९ बातों को ध्यान में रखना !!!

              आत्मनिर्भर  बनना चाहते हो ?  ९  बातों को ध्यान में रखना !!!  
   
आप सिर्फ डिग्री लेकर या सपने देखकर ही मंजिल तक नही पहुंच सकते। इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी पसंद की फिल्ड चुन कर उसके मुताबिक खुद को काबिल बनाएं  व बदलते वक्त के साथ साथ उस फिल्ड की नॉलिज रखें  और बदलाव के लिए तैयार  रहें । 

१ फस्ट इम्प्रेशन व इज था लास्ट इम्प्रेशन :- देखिये जब आप पहली बार किसी से मिलते हैं ,सामने वाला इंसान आपके पैसे या डिग्री नही देखता।वह सबसे पहले आपके नजरिया को देखता है । किसी भी  इंसान के सामने हाथ बढ़ाने से पहले  ये जरूर सोचता है, कि इस इंसान में क्या क्वाल्टी है और क्या इसके वीक पॉइंट हैं  ? इस इंसान के साथ मेरी कितनी निभ सकती है ?  महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि -

" जब दो व्यक्ति निकट आते हैं तो वो कुछ मर्यादाएं या सीमाएं निर्धारित करते हैं। अगर हम संबंधो पर विचार करें तो देखेगें कि सारे संबंधो में सीमाएं हैं जिन्हें हम निर्धारित करते हैं । अगर अनजाने में भी कोई इन्हें तोड़ता है उसी क्षण हमारा ह्रदय क्रोध से भर जाता  है । हम अपनी मर्जी थोपते हैं अथार्त दुसरो की स्वतंत्रा को  छीनने की कोसिश करते  हैं "

दुसरो स्वतंत्रता छीनने की बजाए खुद की कमियों को देखर उन्हें निकालने की कोशिस करें। प्रयास करेंगे तो जरूर कामयाब हो जाओगे और एक बार कामयाब हो गए तो फिर मुड़कर देखने की जरूरत नही है । अवसर का पुरा लाभ उठाएं, जमकर मेहनत  करें, ईमानदारी से आगे बढ़े  । 

२ अपने कार्य के प्रति समर्पित रहिए  :- आपको अपने कार्य पर  औरो  से अधिक विश्वाश होना चाहिए। यदि आप में काम के प्रति पैशन है तो आप अपने अंदर की सारी खामियों को पार कर लोगे । आप उसमे बेस्ट दोगे और आपके साथी भी आपके काम में पुरे मनोयोग से आपका साथ देंगे।मान अपमान की परवाह ना करें। आप को किसी ने गलत बोला है या किसी ने आपको को नीचा दिखाने की कोशिश की है तो उसे अपमान ना समझ कर उससे सीख लें और आगे बढ़ जाये खुद को उत्साहित व कर्मठ रखने की कोशिस करें ।   
३ दृढ़ संकल्प लें :-
"संकल्प मन के ऐसे वचन हैं, जिनको अपने ह्रदय में धारण कर व्यक्ति समस्त आगामी कर्तव्यो के प्रति पूर्ण अस्वस्थ होता है " 
                                                                            -सीया के राम  


दृढ़ संकल्पित लोग रास्ते बदलते हैं मंजिल नही । आने वाली कठनाइयों का सामना करते हैं और हल निकाल कर ही रहते  हैं ।किसी ने सही कहा है कि -

     " कोशिस कर,  हल निकलेगा। आज नहीं तो, कल निकलेगा। 
       अर्जुन के तीर सा निशाना साध, जमीन से भी जल निकलेगा ।
       मेहनत  कर पौधों को जल दे ,बंजर जमीन से भी फल निकलेगा । 
         ताकत जुटा हिम्म्त को आग दे, फौलाद का भी बल निकलेगा ।
       जिंदा रख दिल में उम्मीदों को , समंदर से भी गंगा जल निकलेगा । 
     कोशिस जारी रख कुछ कर गुजरने की, जो है आज थमा थमा वो चल निकलेगा"    



४ प्राथमिकता तय करना जरूरी है :- एक साथ कई महत्वपूर्ण कार्य नही करने चाहिए। और अगर जरूरी  हैं तो उनसे  नही घबराएं बल्कि जरूरी कार्यो की लिस्ट बनाये और एक एक करके काम निपटाए, जरूरत के अनुसार कार्यो को प्राथमिकता दें । इससे पायेगे की आप थोड़े ही समय में अपने कार्यो में निपुण होते जाओगे । 

५ अपेक्षाओ पर खरे उतरें :-  यदि आप ऐसा करेंगे तो आपके साथी आपके और नजदीक आते जाएंगे। उन्हें वो दो जो वो चाहते  हैं उन्हें पता होना चाहिए की आप उनकी परवाह  करते हैं। आपको सबसे पहले उन अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा  जो आप से की जा रही हैं । जब आप अपेक्षाओं  पर खरे उतरोगे तो सीनियर भी आप पर विश्वास करेंगे और इससे आपकी पदोन्ती के चांस भी बढ़ेंगे । कई लोगो को देखा होगा की वे पदोन्नति ना मिलने  का रोना रोये जाते हैं लेकिन अगर ईमानदारी से सोचे तो पायेगे की कभी वे अपेक्षाओं पर खरे ही नही उतरे, सीनियरों का  विश्वास  ही नही जीत पाये ।


६ ओवर कांफिडेंट ना बनें :- विनम्रता व सहजता से जो नही आता उसे सीखने व समझने की कोशिश करनी चाहिए। अपने दिमाग को हमेशा कुल रखना चाहिए। अपने साथियों की हमेशा सुनिए और ऐसा स्वभाव रखिये की आप से हर बात शेयर कर सकें। यही तरीका है नये आइडिया सामने लाने का। आप ये जानने की कोशिस करें कि आपके साथी क्या कहना चाहते हैं। सही बात पर उनकी प्रशंशा कीजिये । सैलरी और शेयर देने से आपको एक तरह की लॉयल्टी मिलती है ,लेकिन हर इंसान को अपनी प्रशंशा सुनना अच्छा लगता है । इसलिए सही समय पर सही शब्दों से की गई सच्ची प्रसंसा का कोई विकल्प नही है। ये फ्री होते हुए भी किसी खजाने से कम नही है ।  

७ अपनी गलतियों को स्वीकारें व उन्हें दूर करें :-मेरा मानना है की कोई भी इंसान जानबुझ कर गलती नही करना चाहेगा। लेकिन जाने अनजाने कई बार गलतियां हो जाती हैं । सफल वही व्यक्ति होता है जो अपनी गलतियों को मानकर सुधारने की कोशिस करता है। गलतियों से सीख लेता है। अपनी गलतियों को मानकर उन्हें सुधारना ही मनुष्य की सफलता की राह प्रसस्त करता है।  




८ हार से ना घबराएं :- दरअसल जीत की  मंजिल तक पहुचने के लिए हार की सीडी से ही गुजरना पड़ता है। लेकिन इसमें उम्मीद का दामन पकड़े  रहें । उम्मीद टूटने से झटका तो लगता है। लेकिन अगर आप हार मानकर बैठ गए तो आपके हाथ कुछ भी नही लगेगा।  महाभारत में आया है कि -  
" भविष्य का दूसरा नाम है संघर्ष । कई बार ह्रदय में प्रबल इच्छा होती है।  वो पूर्ण नही होती तो ह्रदय भविष्य की योजना बनाने लगता है। भविष्य में योजना पूरी होगी ऐसी कल्पना करने लगता है किन्तु जीवन न भविष्य में है  ना अतीत में जीवन तो इस पल के अनुभव में है । पर हम जानते हुए भी इतना सा सत्य समझ नही पाते।  या तो बीते हुए समय के स्मरण को घेरे बैठे रहते हैं या आने वाले समय के लिए योजना बनाते रहते हैं । और सारा जीवन इसी में बीत जाता है। एक सत्य यदि हम जीवन में उतार लें कि ना हम भविष्य देख सकते हैं और ना भविष्य निर्मित कर सकते हैं सिर्फ भविष्य का स्वागत कर सकते हैं   "       

९ लगातार प्रयास करते रहें :- ये जरूरी नही है की आप जो कार्य कर रहे हो उसमे पहली ही बार में सफलता मिल जाएं। लेकिन लगातार प्रयास करने से सफलता मिलनी सम्भव है। कई  लोग असफल होने पर कोशिस करना छोड़ देते हैं । और कई लोग लगातार प्रयास करते रहते हैं और ये लगातार प्रयास करना ही सफलता की मंजिल तक पहुंचाता है ।  






Tuesday, March 8, 2016

सहन शीलता की कमी कही बच्चो को लक्ष्य से ना भटका दे

             
सहन शीलता की कमी  कही बच्चो को लक्ष्य से ना भटका दे  

सहन शीलता का मतलब है कि आप किसी भी बात पर तुरंत प्रतिक्रया ना करें। थोड़ी देर रुके] सोचे] समझे फिर जवाब दें। इससे बात की गहराई का उसके अर्थ का व कहने वाले का भाव व व्यक्तित्व का आप भली भाति अनुमान लगा सकोगे। अगर आपको सामने वाले की कोई बात बुरी भी लगी है तो आप इतनी देर में मन को शांत कर लोगे।फिर आप जो प्रतिक्रया दोगे वह अधिक प्रभावशाली होगी। ऐसा करने से आप का व्यक्तित्व निखरेगा। लेकिन आप ऐसा तभी कर सकते हो जब आप के अंदर दुसरो की बात को सुनने का गुण होगा दुसरो की बात सुनने वाला ही दुसरो से कुछ सीख सकता है । इंसान सहनशील हो तो वह हमेशा कटुता व राग दुवेश से बच सकता है, सबकी निगाहो में एक आदर्श व्यक्ति के रूप में जाना जा सकता है। सहनशीलता से सकरात्मकता आती है,सकरात्मकता इंसान को लक्ष्य के करीब लाती है । 

सहन शील बनें, सहनशील इंसान  हर जगह तरक्की करता  है :- सहन शीलता व्यक्ति को उंचाई पर पहुचाने में मदद करती है। जिस व्यक्ति के अंदर सहनशीलता होती है वह धैर्यवान व गंभीर बन जाता  है वह अपने कार्य को लग्न व सकरात्मक सोच से करता है। और लक्ष्य को हासिल करने के लिए ये जरूरी भी है की आप अपने कार्य को सकरात्मक सोच से करें। ऐसे इंसान से हर कोई सलहा लेता है, सीखना चाहता है, रोजगार देना चाहता है। सहनशीलता खुशियों की परिचालक  हैं। अगर सहनशील दोस्त हो तो उससे  बहुत कुछ सीखा जा सकता है । दोस्तों से व्यक्ति को भावनात्मक स्पोट मिलता है। और समाज के विकाश के लिए स्पोट जरूरी हैं । दोस्तों से सम्पूर्ण विकाश होता है । दोस्तो का असर सही भी और गलत भी हो सकता है । लेकिन दोस्त जरूरी हैं । बच्चो पर ये दवाब ना डालें  कि  उनके दोस्त सही है  या गलत है बच्चो को सही गलत का फैसला खुद लेने दें। साथियो को देख कर ही बच्चे अपने व्यवहार व दृष्टिकोण में बदलाव लाते  हैं ।   



सहनशील इंसान ही सभ्य समाज का निर्माण कर सकता 
है:- हर इंसान के सामने दो रस्ते होते हैं एक सही और दूसरा गलत  इंसान इन में से एक को  ही चुन  सकता है चाहे व  सही चुने  या गलत । गलत आपको आकर्षित करेगा और सही आपको कठिन लगेगा। लेकिन गलत राह से आगे नही बढ़ पाओगे ।  सही से  ही आप आगे बड़ सकते हो । सही राह चलने वाला अकेला तो पड  सकता है लेकिन हार नही सकता। इसलिए नकरात्मकता को हम खत्म तो नही कर सकते और  हमे  लड़ने की भी  आवश्यकता नही है । इसलिए लड़ने की बजाए हम उसके सामने अच्छाई और सच्चाई की लकीर जरूर खीच सकते हैं।अपने बच्चो को समझाए की वे दोस्तों में नफरत व कटुता बोन की बजाए प्यार व शांति की मिसाल कायम करें । इससे ही सभ्य समाज का निर्माण हो सकेगा । अगर व्यक्ति किसी भी कार्य को प्रतियोगिता की भावना से करे तो उसमे सफलता मिलनी  अनिवार्य हो जाती  है।लेकिन प्रतियोगी परीक्षा के  लिए सहनशील होना अनिवार्य है । यदि आप चाहे कि  परिणाम तुरंत मिल जाये तो  इससे अपना काम  खराब कर लोगे । लेकिन आज के  युवा कार्य में मेहनत  करने से ज्यादा परिणाम की उम्मीद  करते हैं ।   

"कामयाबी के लिए ये  जरूरी है  कि सहनशील ,धैर्यवान और लगनशील हों । युवा पीढ़ी में सहनशीलता के गुण  डालना बहुत जरूरी है । इसके लिए बचपन से ही प्रयास करें " 

                      &शेर सिंह वरुण प्राचार्य जीआईसी नोएडा 


आभाव को चुनौती के रूप में लें:-  अक्सर लोग आभाव को मजबूरी मान बैठ  ते हैं । जब की इसे अगर चुनौती के रूप में लें तो बेहतर परिणाम पाये जा सकते हैं । जो बच्चे इसे चुनौती के रूप में लेते है उन्हें जीवन के सफर में  किसी भी परिस्थति से निबटने में परेशानी नही होती। ये वो हुनर है जिस के बल पर  आप किसी भी हालत में अपने लिए बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हो।इसलिए बच्चो को सिखाया जाना चाहिए की वह अपने से नीचे दिखने वाले लोगो को देखकर जीवन की असल परिभाषा को समझें। इससे उन्हें जीवन  मे कभी भी हार का सामना नही करना पड़ेगा। महाभारत में आया है कि 


" कभी कभी कोई घटना मनुष्य के जीवन की सारी योजनाओ को तोड़ देती है । और मनुष्य उस आघात को अपने जीवन का केंद्र मान लेता है। पर क्या भविष्य मनुष्य की योजनाओ पर आधारित होते है \नही जिस प्रकार  किसी उंचे पर्वत पर सर्व प्रथम चढ़ने वाला पर्वत की तलाई में बैठ कर योजनाएं बनाता है क्या वो योजनाएं पर्वत की चोटी तक पहुचाती है \नही वास्तव में वो जैसे जैसे  ऊपर चढ़ता है वैसे वैसे उसे नई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है प्रत्येक पद पर वह अगले पद का निर्णय करता हैa योजनाओं को बदलना पड़ता है ।कही पुरानी योजनाएं उसे खाई में ना धकेल दें । वह पर्वत को अपने योग्य नही बनाता बल्कि स्वयं को पर्वत के योग्य बनाता है। मनुष्य के जीवन में भी ऐसा ही होता जब मनुष्य किसी अवरोध को या चुनौती को केंद्र बना लेता है  तो वह अपने जीवन की गति को वही  रोक देता है ।फिर  वह सफल नही हो पाता । अर्थात जीवन को अपने योग्य बनाने की बजाए खुद को जीवन के योग्य बना लें यही सफलता व शांति का मार्ग है" 


बच्चो में  तर्क संगत सोच अनिवार्य है:-तर्क की प्रतिक्रया वैज्ञानिक ज्ञान के नजदीक होती है।और ये उम्र के साथ साथ और भी बेहतर होती जाती है। आप लक्ष्य तक तभी पहुंच सकते हो जब सच्चाई और ठोस तर्को के साथ हो।तर्क भी दो तरह के हैं एक व्यवहारिक दूसरे जो विश्वास पर आधारित हो। बच्चो में तार्किक सोच विकसित करने के लिए पैरेंट्स व अभिभवकों को अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए। देखना चाहिए की उनका बच्चा वैज्ञानिक ज्ञान के कितने नजदीक है। कई  बार लक्ष्य तय होने के बाबजूद हम फैल हो जाते है लेकिन फिर भी हम प्रयास करते हैं क्यों \ क्यों की हमारा विश्वास  होता है की हम सफल होगें । 

बच्चो में सहन शीलता का गुण विकसित करें:- इसके लिए माँ बाप व शिक्षक अपनी जिम्मेदारी समझें। कई बच्चे मन मानी  करते हैं अपनी हर बात मनवाने की कोशिस करते हैं उनकी हर शर्त पूरी ना करें ।उनकी हर एक्टिवटी पर ध्यान दें ।श्री मद भागवत में भी आया है कि &
 "संतान जब तक पांच साल की ना हो जाए तब ही तक उसका लाड़ प्यार करना चाहिए। उसके बाद सदा संतान की शिक्षा की और ध्यान देते हुए उसका पालन पोषण करना उचित है। अच्छा खान पान उत्म वस्त्र अच्छी पढ़ाई का प्रबंध करना ये सब बातें संतान की पुष्टि के लिए आवश्यक है साथ उत्म गुण और विधा की और भी लगाना चाहिए । पिता का कर्तव्य है कि वह संतान को सद्गुणों की शिक्षा देने के लिए कठोर बना रहे । बच्चो के सामने कभी भी उनके गुणों का वर्णन न करें । उसे  सही राह पर लाने  के लिए कड़ी फटकार  देकर, इस प्रकार साधे की वह विधा और गुणों में सदा ही निपुण होता जाए, शिक्षा बुद्धि से ताड़ना और पालन करने पर संतान सद्गुणों दुवारा  प्रसद्धि पाता  है   " 

अभिभवक बच्चो के  भविष्य को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं । महाभारत में भी आया है कि &

" शिक्षा और सुरक्षा से मनुष्य का चरित्र बनता है । माता पिता जैसा चरित्र बनाते हैं वैसा ही बच्चों का भविष्य बनता है। किंतु अधिकतर माँ बाप भविष्य की सुरक्षा के चककर में चरित्र की शिक्षा देना भूल जाते हैं । लेकिन जिनके माता पिता चरित्र को भुलाकर भविष्य की चिंता करते हैं उनके बच्चो के हाथ कुछ भी नही लगता किन्तु जिनके माता पिता उनके चरित्र की चिंता करते हैं उनकी प्रस्तति सारा संसार करता है " 

बच्चो को अनुशासित रखना व उनकी पर्सनल्टी को विकसित करना अभिभावकों की जिम्मेदारी है लेकिन उन्हें इसके लिए भी तैयार करना की वे बाहरी खतरों से भी लड़ सकें । अगर बच्चों की नीव कमजोर रह गई तो ये जिंदगी की राह में पिछड़ जाएंगे ।  



समायोजन का गुण बच्चों में जरूरी है:- आज का इंसान जहा इतना सेल्फिश हो गया है कि अपने और अपनों के सिवाय कुछ सोचता ही नही है। वहा फिर से आने वाली पीढ़ियों को नैतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए पैरेंट्स व अध्यापको को कई कार्य करने जरूरी है बच्चो में लोकहित व सहयोग की भावना डालनी जरूरी है ।जरूरी नही है कि  हर जगह  एक जैसा  महौल मिले  हर जगह एडजस्टमेंट की जरूरत पड़ती है। इसलिए अपने आप को  ऐसा बनाना चाहिए की हम हर राह  पर चलने में सक्षम हों। विपरीत परिस्थति आने पर ना घबराएं और संयत रह कर काम करें ।शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत बनें । अगर विपरीत परस्थिति में एडजेस्ट करने की व खुद को साबित करने की हिम्मत  होगी तो जीत निश्चित है। समायोजन का गुण इंसान को सफल होने की डगर तय करने की  हिम्मत देता है ।जीवन में सफलता समायोजन की क्षमता पर काफी हद तक निर्भर करती है। 

Friday, February 19, 2016

बेहतर लाइफ जीने के लिए जरूरी हैं कुछ रूल्स

                                                     बेहतर लाइफ जीने के लिए जरूरी हैं कुछ रूल्स                                    
दोस्तो अपनी लाइफ में बेलेंस बनाये रखने के लिए कुछ रूल्स अनिवार्य हैं। रूल्स हमें डिसिपिलीन में रहना तो सीखाऐगे ही हैं साथ ही साथ हमे टेंसन फ्री भी रखेंगे ।गौतम बुद्ध ने भी कहा है कि 

"अगर आप का खुद पर पूरी तरह नियंत्रण है तो आपको वह क्षमता हासिल होगी जिसे बहुत कम लोग हासिल कर पाते हैं" 
  
जिन लोगो की लाइफ में रूल्स नही होते वे लोग लाइफ में कभी कामयाब  भी नही हो पाते। कामयाबी के लिए जरूरी हैं  लाइफ में  दस रूल्स -


१ समय समय पर अपना मूल्यांकन करें  :- किसी भी कामयाब इंसान को देखो वह कुछ रूल्स फॉलो करके ही कामयाब हुआ है । कामयाबी चाहते हो तो लाइफ में कुछ रूल्स बनाओ और उन्हें फॉलो करो।  हम रूल्स पर चलकर ही ओरो से कुछ अलग बन सकते हैं । कई बार हम रूल्स तो बना लेते हैं पर वो बीच बीच में  टूट जाते हैं।  पर यदि हम उन्हें दुबारा अपनी लाइफ में लागू करने की कोशिस करें तो लाइफ में जरूर कामयाब हो सकते हैं । ज्यादातर लोग  अपनी कमियां देखना ही नही चाहते । अगर आप इस भेड़ चाल से बचना चाहते हो तो इसके लिए एक ही रास्त है कि आप समय समय पर अपना मूल्यांकन करते रहें ।


२ गलतियों से सीख लें  :-गलती किसी से भी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये नही है की हम उस गलती को बार बार दोहराते जाएं । जब तक आप गलतियां करना नही छोडोगे तब तक आप कामयाब नही हो सकते । अगर आप लाइफ में कामयाबी चाहते हो तो अपनी तो क्या दुसरो की गलतीयों  से भी सबक लो । जो अपनी कमियां ना देखकर दुसरो में कमी देखते हैं उनमे अंहकार आ जाता है जिसकी वजह से वो खुद को श्रेष्ट और ओरो को हीन समझने लगता है। और दुसरो की निंदा करने लग जाता है इसलिए हमेशा दुसरो के गुण और अपनी कमियों पर ध्यान दें । 

 " अगर में महान बनना चाहता हूं तो पहले मुझे अपने आप पर विजय पानी होगी इसे ही स्व अनुशासन कहते हैं 
                                                 -हैरी एस टुमॆन पूर्व अमेरिकी राष्टपति  

३ प्राथमिक कार्य को वरीयता दें :-लाइफ में बेलेंस बनाएं रखने के लिए इंसान को अनेको कार्य करने पड़ते हैं । लेकिन ये ध्यान रखे की आप हर कार्य में कुशल नही हो सकते। इसलिए खुद को अपनी क्षमता से अधिक कार्य में व्यस्त ना रखें । जिन कार्यो में ओरो की मदद ले सकते हो उन कार्यो में मदद लें  और जिन कार्यो को बिना करें काम चल सकता है  उन्हें ना करें ।  जो कार्य आप के लिए अनिवार्य हैं पहले उन्ही कार्यो को निपटाएं। प्राथमिक कार्य वो हैं जिसको आप सबसे मूलयवान समझते हो , प्रथमिक कार्यो को तरहीज देने का मतलब है कि अपना समय और ऊर्जा   अधिक से अधिक उन कार्यो में लगाना ।  

  
४ कंफर्ट जोन से बहार निकलें :-देखिये जोखिम  उठाये बिना आप लाइफ में आगे नही बढ़ सकते । सोच समझ कर जोखिम लेना ही सही निर्णय है । औरो की बनाई  राह पर चलना छोड़ दो । कई  लोग इसलिए कामयाब नही हो पाते क्यों कि वो दुसरो की  राह पर चलते है और इंसान उसी फिल्ड में कामयाबी पा सकता है जो उसने खुद चुनी है । दुसरो को  अपना लीडर ना बनाएं । अपनी लाइफ के खुद लीडर बनें । नए काम में लोग साथ देने की बजाए अपनी सोच थोपते हैं ऎसे में विचिलत ना हों अपने आप को समझाएं, खुद के फैसले पर यकीन रखें ।  

५ हमेशा अपनी तरफ स बेस्ट देने की कोशिस करें :-  इंसान कभी भी परफेक्ट नही बन सकता। कोई काम कितनी ही अच्छी तरह से करो फिर भी सुधार की गुंजाइस  हमेशा बनी  रहती है इसलिए बेस्ट देने की कोशिस करें ना की परफेक्ट बनने की । 


६ हर परस्थिति में खुश रहने की आदत डालें :- ज्यादातर इंसान परस्थिति पर निर्भर रहता है। अनुकूल परस्थिति में खुश व प्रतिकूल में दुखी रहता है । दोस्तों हम कोशिस कर सकते हैं परस्थितियों  पर हमारा जोर नही चल सकता । अगर आप प्रतिकूल परिस्थति में दुखी रहते हो तो आप  एनर्जी व  समय  नष्ट कर रहें हो । सीरियल सीया के राम में भी कहा गया है कि 
              " परिस्थति में सुख या दुःख ढूड़ना तो इंसान की मनोस्थति पर निर्भर करता है "

७ शिष्टाचारी बनें :- शिष्टाचारी इंसान हर जगह मान सम्मान पाता है । जहां भी जाता है वहां अपने  शिष्टाचार से अलग पहंचान बनता है । और ऎसे दोस्त बनता है जो समय पड़ने पर काम आते हैं। और वैसे भी कहते हैं की इंसान की वाणी में वो ताकत है जो होते हुए काम को बिगाड़ सकती है और रुके काम को करवा सकती है। मधुर वाणी ही शिष्टाचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है । 

८ शॉर्ट कट से बचें  :-  शॉर्ट कट से कभी भी स्थाई कामयाबी नही मिल सकती । कामयाबी तब ही टिकती है जब सघर्श करके हासिल की हो। कुछ बातें हमेशा ध्यान में रखना जिन लोगो ने आपकी मदद की  है उनके प्रति ईमानदार रहें। मेहनत का उचित फल ना मिलने पर धैर्य रखें और किसी भी परिस्थति  में  गलत रास्ता ना अपनाएं।   

९ खुद को काबिल बनाएं :- जब तक आप खुद काबिल नही हो दुसरो को कुछ कहने का हक नही रखते । और ना ही दुसरो पर आपके कहे का कुछ असर होगा ।इसलिए जैसा आप दुसरो से उम्मीद करते हो उसके लिए पहले खुद वैसे  बनो। कहने की बजाए करके दिखलाओ । 


१० आत्मनिर्भर बनें :- दोस्तों उन लोगो की लाइफ में अधिकतर टेंशन रहती है जो दुसरो पर निर्भर रहते हैं। इसलिए दुसरो पर निर्भर रहने की बजाय आत्मनिर्भर बनें । अपना कार्य स्वयं करें  व दुसरो से अपेक्षा ना करें । अपेक्षा ही परेशानी का सबब बनती है ।