Thursday, July 21, 2016

जैसी सोच वैसा व्यक्तित्व !!!


                                       


जैसी  व्यक्ति की सोच  होगी वैसा ही उसका व्यक्तित्व होगा । तभी तो कहते है  सोच अच्छी होनी चाहिए । मन में दोनों प्रकार के विचार आते हैं अच्छे भी और बुरे भी । विरोधभास चलता रहता है।  बुरे विचार आते हैं तो अच्छे विचार भी  जरूर आते हैं , और अच्छे विचारों के बीच में बुरे विचार भी  जरूर आते हैं। मन में उठने वाले विचरो को नियंत्रण करके ही जीवन को मनचाहा आकर दिया जा  सकता है । अच्छे विचारों का चयन कर जीवन को उन्नत किया जा सकता है  और बुरे विचारों का  चयन गर्त में ले जाता  हैं ।  इंसान अपनी सगति व  विचारो से ही साधु या चोर बनता है । एक विचारो से इतना गिर जाता है जिसकी वजह से घरवाले भी शर्मिंदा होते हैं और एक समाज में अपना व अपनों का नाम रोशन करता है । 

आपने लोगो को कहते सुना होगा कि पुरषार्थ से  कार्य सिद्ध होते हैं , इच्छा से नही । लेकिन इच्छा के बिना पुरषार्थ भी नही  किया जा सकता। पुरषार्थ भी इंसान तभी करता है जब मन में इच्छा उतपन होती है । इच्छा  ही पुरुषार्थ को प्रेरित करती है । लेकिन कई बार पुरषार्थ करते हुए भी इनसान सफलता से कोसो दूर रहता है। क्यों ? क्यों कि लक्ष्य प्राप्ति पुरषार्थ पर नही इच्छा पर निर्भर करती है ।  कालिदास का कहना है कि - 

      "मनोरथ के लिए कुछ भी अगम्य नही  है। इच्छाएं ही हमे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं " 


सकारात्मक इच्छाएं हमे सफलता देने में कारगर साबित होती हैं ।  वे नकारात्मक  इच्छाएं असफल बनाती हैं । इसलिए जैसी इच्छाएं वैसे परिणाम हासिल होते हैं । इच्छाओं को कल्पवृक्ष माना गया है । जो हम सोचते हैं वो  हो जाता  है ।  अगर मन को नियंत्रित कर के सकारात्मकता की तरफ लगा लिया जाये तो पारस पथर हाथ लग जायेगा। फिर जीवन को कल्पवृक्ष बनते देर नही लगेगी।  फिर आप  अपने जीवन से जो चाहोगे उसे हासिल कर सकोगे । मनोविज्ञान के अनुसार भी

       " जो मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही उसका व्यक्तित्व बन जाता है " 

 इसलिए अपना कार्य इच्छा पूर्वक श्रेष्ठता से करना चाहिए।  फिर चाहे आप के कार्य की सराहना हो या ना हो , हमे वो ईमानदारी से करना चाहिए । श्रेष्ठता अपने अंदर से ही आती है ना की बाहर से । कोई भी श्रेष्ठ काम खुद के  satisfaction के लिए करना चाहिए ।  श्रेष्ठ काम ही इंसान को श्रेष्ठ बनाता है । और श्रेष्ठ इंसान कथनी मे नही  करनी में विश्वास रखता है । कन्फुशियस ने भी कहा है कि -

         " श्रेष्ठ व्यक्ति कथनी में कम और करनी में ज्यादा होता है ' '

Wednesday, July 20, 2016

गलत आदत छोड़कर पूर्ण बनो , कामयाबी पूर्णता मांगती है !

                                       

                           

दोस्तों! हर इंसान में कुछ अच्छी आदतें और कुछ गलत आदतें होती हैं। अच्छी आदतें हमे सक्सेस बना देती हैं और गलत आदतें हमें फैलियर बनाती हैं । दोस्तों जब आदत से ही इंसान सक्सेस  या फैलियर बनता है तो आदतें तो बदली जा सकती हैं ! गलत आदतों को बदलकर हम सक्सेस बन सकते हैं! आइये जानते हैं कि किन -2 गलत आदतो को बदलना अनिवार्य है  -  


१ किसी भी चीज का हैबुच्वल होना :- दोस्तों ! कई लोग गलत चीजो के हैबुच्वल हो जाते हैं | जैसे- शराब ,सिगरट गुटका या देर तक सोने के और फिर उस आदत को चाहकर भी नहीं छोड़ पाते | हमे अपनी सहूलियत व समय के अनुसार खुद की आदतों को बदलते रहना चाहिए । कहते हैं कि -

"जो लोग समय के अनुसार खुद को नही बदल सकते वो जिंदगी में आगे  नही बढ़ सकते " 

२  दोस्तों में समय बर्बाद करना  :- एक बात याद रखना, हजारों लोगो में से एक दो ही मुश्किल से कोई  सच्चा दोस्त मिलता है। और किसी से ही आजीवन हमारी दोस्ती रहती है। वरना सब सेलफिश और टाइम पास ही होते हैं। जो काम निकलने पर छोड़ कर चले जाते हैं और उनके चक्कर में फंस कर घर ,परिवार, कार्य व बच्चो पर क्वालटी समय नही दे पाते। जब कि वो लोग सिर्फ अपना टाइम पास और हमारा टाइम बर्बाद करते हैं। वे अपने मतलब के लिए हमे यूज करते हैं और हम बेकुफो की तरह अपना कीमती समय बर्बाद करते हैं । आप खुद सोचो कि आपके कितने सच्चे दोस्त हैं ? कितने आपके सुख दुःख में साथ दे सकते हैं? कितने लोग आपको समझते हैं? कितने लोग आपकी पीठ पीछे क्रिटिसाइज नही करेंगे ?  कितने लोगो पर आप विश्वास कर सकते हैं ?ज्यादातर लोग ऐसे होंगे जो आपके सामने मुंह मीठे और बाद में आपकी जड़ काटने वाले होंगे । एक इमेज पढ़ी थी -

 " अपनी पीठ से निकले खंजरों को जब गिना मैने , ठीक उतने ही निकले जितनो को गले लगाया था "

होने के लिए ये एक नैगेटिव थोट है ,लेकिन इसे हम नकार भी नही सकते। ये भी सच है कि  वे ही लोग हमे धौखा देते हैं, जिन पर हम खुद से ज्यादा यकीन करते हैं। अगर आपको ये लगता है की आपके बहुत सारे दोस्त हैं तो आप कुछ ऐसा करिये, जो कभी उन्होंने ने किया हो, जिसे वो करने में सक्षम ना हो, जिससे आपकी समाज में इज्जत हो नाम हो। तब देख लेना जो दोस्ती का दावा करते हैं, वे ही भागते दिखेंगे। फिर आप अकेले या एक दो ही रह जाओगे। सच्चे दोस्त की पहंचान दुःख  में नहीं सुख  में होती है। दुःख में किसी को ईर्ष्या नहीं होती या कोई तुलना नही करता। सुख में जलन होती है जो आपके सुख में दिल से साथ है वही आपका सच्चा दोस्त है । लेकिन ऐसे लोग कमी मिल पाते हैं जो दुसरो के सुख में दिल से साथ हो नही तो-   

"हम कितने ही बड़े व बुद्धिमान क्यों न हो जाएं फिर भी किसी दूसरे की सफलता का उतसव पुरे दिल से नही मना पाते " 

३ फिजूल खर्च करना  :- कई लोग खुद से ही परेशान हैं कि अपने खर्चे कम कैसे करें। कई लोगो के अधिक दोस्त होने की वजह से सामाजिक दायरा बढ जाता है, घूमते फिरते ज्यादा हैं इस वजह से दोस्तों पर खर्च ज्यादा होता। इसलिए बोल चाल सबसे रखो लेकिन दोस्त कम बनाओ। उनपर भी ज्यादा खर्च करके अपने लिए और उनके लिए बोझ मत बढाओ । कहते है  कि -

" इस तरह ना कमाओ कि पाप हो जाएं ! इस तरह ना खर्च करो कि कर्ज हो जाएं ! इस तरह ना बोलो कि क्लेश हो जाएं "

सिर्फ इंसानियत के नाते या समाज में रहने के नाते ही खर्च करें । और एक ऐसा लक्ष्य बनऐ जिसमे बहुत सारा पैसा चाहिए। इससे आप सोच समझकर पैसे खर्च करने लगोगें  । 

४ रिस्तों का आदी होना :-  हम दोस्तों या किसी भी रिश्ते के इतने आदी हो जाते हैं कि हम अपनी लिम्ट ही भूल जाते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि दोस्त या रिलेटिव हमारी परछाई नहीं हैं जो  वो हर जगह हमारे साथ चले या हमारा साथ दें । उनकी भी पर्स्नल लाइफ है । कई बार हम उनकी  गलतियों पर पर्दा डालते हैं। या गलत बातों में भी हाँ में हाँ मिलाते हैं। और सही गलत का विचार किये बिना ही उनकी सलाह मान लेते हैं । जबकि हमारा सलाहकार कौन  है ये बहुत महत्वपूर्ण है क्यों कि-

" दुर्योधन शकुनि से सलाह लेता था और अर्जुन श्री कृष्ण से "


हमेशा  सही इंसान  से सलाह लेनी चाहिए और  सच का साथ  देना चाहिए। इससे आपके साथ कोई रहे या ना रहे । ये डर मन से निकाल देना चाहिए। जो आपको सही सलाह या  सच का साथ देने से रोकें, उसे ज्यादा समझाने की कोशिस नही करनी चाहिए। कहते हैं कि -
 
" स्पष्टीकरण वहां देना चाहिए ,जहां उसे सुनने और समझने वाला एक खुला दिमाग हो । अगर किसी ने आपको गलत मान लिया है तो उस पर सफाई देने का मतलब खुद को खुद की नजरो में गिराना है "  

५ आलश्य में  पड़े रहना :-  आलसी इंसान का कोई भी कार्य समय पर पूरा नही हो पाता। और होता भी है तो उसकी क्वालटी डाउन रहती है क्यों कि वो जो भी करेगा समय रहते नही करेगा फिर जल्द बाजी में अच्छी तरह से नही कर पायेगा। अगर आप लाइफ में आगे बढ़ना चाहते हो तो अपने सामने एक लक्ष्य तय कीजिये। जब आपके सामने लक्ष्य होगा तो आप आलश्य नही कर पाओगे। आप अपने लक्ष्य के पीछे ऐसे लगोगे कि आप की आलस्य करने आदत छूट जाएगी । इसलिए कामयाब होने का संकल्प लो। और एक बात का हमेशा ध्यान रखना कि गलत आदतें  उन्ही लोगो में पाई जाती हैं जिनकी लाइफ का कोई मकसद नही होता ।  








Monday, July 18, 2016

किसी से तुलना ना करें !

                                               



ज्यादातर लोगो को देखा होगा कि वो खुद को अधूरा, कमतर या बेहतर मानते हैं। मानसिक नाप तोल करते रहते हैं । जब आप ऐसे लोगो से मिलते हो तो आप भी हस्तांरित हो जाते हो। यदि आप किसी के सामने खुद को कमतर आंकते हो तो दुखी  महसूस करते हो और यदि खुद को बेहतर माप ते हो तो सुखी महसूस करते  हो । 

"अपने जीवन की दूसरों से तुलना ना करें। आपको इस बात का बिल्कुल भी भेद नहीं है कि उनकी जीवन यात्रा किस प्रकार की रही है "
                                                                            -एनोनिमस 


आइये आप को ऐसी ही तीन बहनों की कहानी सुनाती हुं -

तीन बहनें थी लेकिन तीनो के हालात अलग अलग थे । जो सबसे छोटी थी वो सबसे गरीब घर में थी,  जो बीच की थी वो मिडिल क्लास घर में थी, और जो सबसे बड़ी थी वो सबसे रहीस घर में थी । छोटी  और बीच वाली में बहुत प्यार था , जब भी  छोटी  बहन अपनी बीच वाली बहन से मिलती तो उसके ठाठ बाठ देखकर बेचैन हो जाती क्यों कि  अपने आपको कमतर आंकती थी। एक दिन उससे रहा ना गया  और बोल ही दिया कि बहन आप के पास सब सुख सुविधा है आप तो सुखी हैं। मेरी क्या है में तो बहुत ही गरीब हुं ! बीच वाली बहन बोली नही बहन में सुखी नहीं हुं मेरे पास सब सुख सुविधा तो है लेकिन मेरे पति  ने अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए बहुत कर्जा ले रखा है । अब उसे उतारने में बड़ी दिक्क्त हो रही है, मुझे डर लगता है कि अगर ये समय पर नही दिया गया तो सब कुछ बिक जाएगा, समाज में बदनामी होगी । हम तीनो बहनों में तो बड़ी बहन ही सुखी है क्यों कि उसके पास नाम है शोरहत है पैसा है विदेशों मे घुमती  है। चल बड़ी बहन से पूछते है वो कैसी है जब बड़ी बहन के घर पहुंचीं तो देखा की उसके पास बड़ा सा बंगला है, बड़ी बड़ी गाड़ियां हैं , घर में हर सुख सुविधा है,  अच्छा कारोबार है, बच्चे कामयाब हैं , पढ़ी लिखी घर में बहुएं है, कई नौकर हैं । बड़ी बहन से जाकर  दोनों  मिली, फिर बहन से बोली आप  ठीक हो ? आपको देखकर ख़ुशी होती है कि कम से कम हमारी एक बहन तो सुखी है । बड़ी बहन ये सुनकर मुस्करा दी और बोली बहन आप दोनों को ये गलत फहमी है की में सुखी हूं हमारे घर में पैसा है लेकिन तीनो ही बाप बेटो में पैसे को लेकर झग़डा है। बाप बेटो को जीते जी कुछ देना नही चाहता और बेटे चाहते हैं कि सब कुछ दोनों में बाट दिया जाये । इस वजह से पिछले कई महीनों से बाप बेटो में बोलचाल तक बंद है। और एक दुसरे के दुशमन बने हुए हैं । अब तुम ही बताओ जिस घर ऐसे हालात हो तो कोई सुखी कैसे रह सकता है ? दोनों बड़ी बहनें मिलकर छोटी बहन से मिलकर बोली की हम तीनो में तुम ही सुखी हो, घर में प्यार है, विश्वास है, सम्मान है, फ्रीडम है, तुम दुःखी कैसे हो सकती हो  ? पैसे में सुख नहीं है पैसा तो सिर्फ इतना होना चाहिए जितना की गाड़ी में पैट्रोल, अगर सारी गाड़ी में ही पैट्रोल भर दिया तो गाड़ी में आग लग जाएंगी ।        

दोस्तों इस कहानी से आपने क्या प्रेरणा ली ? जब आप किसी ऐसे इंसान से मिलो जिसके पास आपको लगे की सब कुछ है तब आपको पता चलेगा की इस व्यक्ति के जीवन में यहां तक पहुंचने में और अब भी जीवन में अपना कितना संघर्ष है । कोई भी इंसान आपको बाहर से सर्व संपन दिख सकता है लेकिन जरूरी नही है की वो अंदर से भी वास्तविक रूप मे सर्व संपन हो । इसलिए अपनी कमियों पर ध्यान देने की बजाय अपने जीवन के सकारात्मक पहलू को देखें । आपके पास इतने पल्स पॉइंट हो सकते हैं जितने आप को सर्व सम्पन दिखने वाले में  ना हो । जब तक हम दूसरों से अपनी तुलना करें जाएंगे तब तक हम अपनी क्वल्टीयों पर ध्यान नहीं दे पाएंगे । और जब तक हम अपनी क्वल्टीयों पर ध्यान नहीं देंगे तब तक हम किसी भी फिल्ड में कामयाब नहीं हो पाएंगे । और ना ही जो हमे  मिला है हम उसका सुख ले पाएंगे ।
   
दूसरों के सुख के साथ अपने सुख की तुलना करने से दुःख ही प्राप्त होगा । दूसरों की कड़ी मेहनत पर भी हमारी नजर होनी चाहिए । ज्यादातर लोग इस लिए दुखी नहीं होते की वे वास्तव में दुखी हैं वास्तव में उनके दुःख का कारण दूसरों के जीवन का सुख होता है । ये देखकर उनके मन में लालच उपजता है कि ये सुख मेरे जीवन में क्यों नही ? वो ये भूल जाते हैं की हर कामयाबी कुर्बानी मांगती है वो कुर्बानी इन्होने दी है इसलिए इन के जीवन में सुख है । आप दो आपके जीवन में भी सुख होगा । 

शिक्षा कभी बेकार नही जाती !

            
                           शिक्षा कभी बेकार नही जाती ! 
   
              
दोस्तों ! आज आपको एक बचपन की दोस्त के बारे में बताती हूं । उमेश नाम था उसका जब भी में उसके घर जाती तो हमेशा ही उसके पापा एक ही शिकायत करते कि इसे समझाओं, ये  पढ़ती नही है, ये ध्यान से पढ़े। उसे समझाते तो  उसकी  कुछ समझ में ही नही आता था।  उसे स्कुल में जाना सिर्फ इसलिए अच्छा लगता था कि वहा पर बहुत सारे होते दोस्त थे। जब वह 5 क्लास में थी तो उसके ३० % नंबर थे जिसकी वजह से वो अगली क्लास में नहीं जा सकती थी । इससे उसे बहुत दुःख हुआ । दुःख इस बात का नही  था की वह फैल हो गई है, बल्कि इस बात का था की उसके सारे दोस्त बिछड़ जाएंगे ।

 तब अध्यापक और हम दोस्तों  ने समझाया की कम से कम इतने नंबर तो ले आ जिससे तू पास हो जाएं और हमारे साथ में बनी रहे, नही तो तू हर बार फैल होती जाएगी और हम आगे बढ़ते जाएंगे इससे तो हम बिछड़ जाएंगे । आखिर ये बात उमेश की समझ में आ गई । और उसने अध्यापक से और हम सब से वादा किया की अब वह कभी भी फैल नहीं होगी । लेकिन  सिर्फ वह इतनी महेनत करती की हर बार पास हो जाये  । ऐसे करते करते हम 10 क्लास में आ गये । उसी समय एक लड़की का रिस्ता टूट गया, क्यों कि लड़का पढ़ी लिखी लड़की चाहता था । 

उस घटना ने  उमेश का दिल झकजोर कर रख दिया । उस दिन उमेश ने हम सबसे वादा किया की में हमेशा खूब मेहनत करके पढुगी । फिर उसने पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया। उसकी मेहनत भी रंग लाई,  उसने १२ की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की ।  उमेश के पापा उसे पढ़ा लिखाकर अध्यापिका बनाना चाहते थे । लेकिन जब वह  बी. ए  में थी तभी उसके लिए एक अच्छा रिस्ता आया और उसके भाइयों ने पापा को समझा बुझा कर  उमेश का रिस्ता वहा तय कर दिया।  उमेश के पापा ने भी कोई ऑब्जेक्सन नहीं उठाया क्यों कि लड़के की सरकारी नौकरी थी घर भी अच्छा था वो इस मौके को खोना नही चाहते थे । और उमेश की बहुत  ही जल्दी  शादी  कर  दी । 

लेकिन कुछ साल के बाद ही वह लड़का खत्म हो गया । उमेश के दो बच्चे हैं ,  अब उमेश को पति की जगह नौकरी मिल गई  है, और अपने दो बच्चों को पाल पोस रही है । दोस्तों में ये कहना चाहती हूं कि शिक्षा कभी भी बेकार नही जाती । बल्कि मुसिबत के समय ये ही हमारे सबसे ज्यादा काम आती है। कहते है ना चोर चुरा सकते है ना कोई बाट सकता है  और ना ये कभी खराब हो सकती है । शिक्षा एक ऐसी चीज है जो जिंदगी में हमेशा आपके काम आती है । इसलिए लाइफ में जब भी समय मिले तभी जितनी हो सके शिक्षा अर्जित कर लें । 




Monday, July 11, 2016

दिल खोलकर दूसरों की मदद करें ,मदद करने में लगा पैसा व्यर्थ नहीं जाएगा ...




Image result for khub enjoy kareजीवन यापन के लिए धन इतना जरूरी  है जितना जिंदा रहने के लिए सांस। ये कितना चाहिए ये कहना कठिन  है, जरूरत  तो अक्सर सभी की पूरी हो जाती  हैं लेकिन इच्छाएं कभी भी पूरी नही हो सकती । कहते हैं धन कमाता है इंसान अपनी मेहनत  से, परन्तु मिलता है प्रभु इच्छा से जिसे हम  भाग्य कहते हैं। और भाग्य इंसान स्वयं  बनाता  है। और ये सत्य भी है जैसे इंसान कर्म करता है वैसा ही इंसान का भाग्य बन जाता है । महाभारत में भी आया है कि -  

" भविष्य दिन प्रतिछन निर्मित होता है, भविष्य कुछ और नही बल्कि आज के निर्णय व कर्म का परिणाम है " 
                                                    
हमारा कर्तव्य है  की अपनी कमाई का कुछ हिस्सा जरूरत मदों की मदद में लगाए। जो लोग दूसरों की मदद करते हैं उन्ही को भगवान देता हैं । उनके धन में ही वृद्धि होती है। और कहते भी हैं कि  छीन कर  खाने वालो का कभी  पेट नही भरता और बांटकर खाने वाला कभी भूखा नही रहता । आपने देखा भी होगा कि मदद  करने वाले के पास कभी कमी नही आती । उन्हें जरूरत पड़ने से पहले ही उनकी  बिना मांगे दूसरे मदद कर देते  है।  

 महाभारत मे लिखा है कि -



" अपने सुख दुःख व प्रण का विचार करना और  समाज के प्रति कर्तव्य का विचार ना  करना ये स्वार्थ है ,किंतु सामर्थ्य स्वार्थी नहीं हो सकता "
                                                                        
तुलसीदास जी ने भी कहा है कि

 " तुलसी विलम्ब ना कीजिए ,भजिए नाम सुजान । जगत मजूरी देत है क्यों राखे भगवान ॥  

इसका अर्थ है कि - हे मनुष्य !  तू बिना विलम्ब किए प्रभु के लिए काम कर । फिर संसार मे कोई  ऐसी वस्तु  नही है जो तेरे पास ना हो सके । यदि इंसान मजदूर को काम करने के बदले उसकी मजदूरी देता है, तो क्या भगवान नही देगा ? जो लोग परहित मे लगे रहते है उनकी मजदूरी भी परमात्मा अवश्य देता है । कहते हैं कि-

दान दिया संग चलेगा बाकि बचा जंग लगेगा । धन घर तक साथ चलेगा । पर धर्म और सेवा भाव तो दुसे जन्म में भी आपके साथ चलेगा "
  
इसलिए अपनी  नेक कमाई मे से कुछ हिस्सा परहित के लिए जरूर निकालें । यदि हम सब लोग मिलझुल कर सहयोग और समर्पण भाव में रहकर अनाशक्ति व  त्याग की भावना से कर्म करेंगे तो समाज दारिद्य और दुखों से मुक्त हो जाएगा। मनुष्य को स्वेछा से जिंदगी जीने का हक है परन्तु जब मनुष्य स्वार्थी हो जाता है तो  वह जीवन  में सम्रद्धि पाने की बजाय क्लेश झेलता है । इसलिए अपनी कमाई मे से कुछ राशि जरूर परहित  मे लगाए।  फिर देखिये ,दौलत  और शोहरत  आपके पीछे परछाई की तरह आएंगे। तुलसीदास  ने कहा है कि -   


  
       " परहित है जिनके मन माही । तिन कहूँ जग दुर्लभ कछु नाहि "  
   
भाग्य के साथ अगर कर्म की और ध्यान नही दिया तो कोई आशातीत सफलता प्राप्त नही कर सकते। अपनी कार्यशैली से ही उन्नति मिलती है । इसलिए आप जो भी करते हो नौकरी चाहे बिजनेस उसे पूरी मेहनत , ईमानदारी  और समर्पण से करें । जब आप कोई भी कार्य पूरी निष्ठा से करते हो तो आप सबके विश्वास पात्र बन जाते हो । विश्वासी व्यक्ति को सभी चाहते हैं। आज की भगादौड़ भरी जिंदगी मे मानव तो तरक्की कर रहा है, लेकिन मानवता कही ना कही पीछे छूटती जा रही है। आज हम सुख सुविधावों के पीछे इतने भाग रहे हैं की हमे किसी के दुःख दर्द की परवाह ही नहीं है । हम धन अपनों के लिए कमाते हैं लेकिन हम अपनों से ही दूर होते जा रहे हैं। हम स्वयं हित के चलते परहित को भूलते जा रहे हैं । जब की महाभारत मे बताया है कि -

"दान  ही एक मात्र ऐसी तपस्या है जो समस्त दोषो का निवारण करता है" 

                                                                                  
 जरूरतमदों की  यथासंभव मदद करके इंसानियत का परिचय दें ।  इस बात का ध्यान रखें की कही हम स्वार्थी ना बन जाये । और कहते है ना इस दुनिया मे लेने वाले को कोई याद नहीं करता जो देता है उसे जरूर याद करता है। सही कहा है किसी ने

 "क्या फर्क पड़ता है हमारे पास कितने लाख,कितने करोड़,कितनी गाड़िया और कितने घर हैं । खानी तो बस दो ही रोटी हैं,जिनि तो बस एक ही जिंदगी है। फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है कि हमने कितने पल ख़ुशी से बिताए ,कीतनो की खुशी की वजह हम बन पाएं " 








Monday, July 4, 2016

बुजर्गो की दयनीय हालत क्यों ?

                      

मै आपको  समाज का एक ऐसा चेहरा दिखती हुं जो देखते तो हम सब है पर उस पर ध्यान नही देते, उस पर सोचना नही चाहते । इसके लिए में आप को कहानी सुनती हुं -  


एक विधवा और अनपढ़  माँ अपने बेटे को पालती  है । जब उस का बेटा बड़ा हो जाता तो गलत दोस्तों की सगत से और ऊपर रोक टोक ना होने की वजह से  उदन्डी हो जाता  है । फिर भी माँ  तो आखिर माँ है वह बेटे को बड़े लाड़ प्यार से पालती है। बड़े होने पर उसकी एक अच्छी और समझदार लड़की से शादी कर  देती है। इससे लड़के के जीवन में भी बदलाव आता है इससे  माँ का समय भी अच्छा कटने लगता है । लेकिन शायद ये  किस्मत को  मंजूर  नहीं था। १५  साल बाद बहू मर जाती है । उसके दो बेटे होते है । माँ सोचती है कि अब पोता इतना बड़ा हो रहा है तो बेटे की दूसरी शादी करनी ठीक नहीं होगी|  ५ ,६ साल बाद पोते की शादी कर  लेंगे । दूसरा अगर इस उम्र में शादी की तो  इस उम्र मे  कोई अच्छे घर की लड़की नही मिलेगी दूसरी कोई मिली तो हो सकता की बच्चे उसे वो सम्मान दे पाएं या हो सकता की वो लड़की एक माँ का प्यार ना दे पाए ये सोच कर  उसकी माँ ७५ साल की उम्र मे खुद बच्चों को पालने की जिम्मेदारी उठाती है । लेकिन  कुछ तो बेटा पहले सी उदन्डी था और कुछ बीबी के मरने पर और उदन्डी हो गया । कुछ लोग ऐसे थे जिनकी निगाह उनकी प्रॉपर्टी पर थी उन्होंने मिलकर उसकी शादी करने की बात चलाने लगे और अपनी किसी बहुत गरीब रिस्तेदार की नाबालिग लड़की का रिश्ता लेकर आए । ये बात जब माँ को पता चली तो उसने इस शादी से  इनकार कर  दिया । उन्होंने लड़के को ही सीखा  बुझा कर शादी के लिए तैयार कर  लिया और लड़के ने अपनी माँ से पूछे बिना ही शादी कर  लाया। अब माँ क्या करें ? माँ ने अपने मन को मर कर  बेटे की ख़ुशी के लिए बहु का स्वागत किया। कुछ ही दिनों मे बेटा उन लोगो के साथ बैठ कर शराब में डूबता चला गया ,और घर पर धीरे धीरे बहु का कब्जा होने लगा । एक दिन ये नौबत आई की दोनों पोतो को लेकर दादी को घर से निकाल दिया । शराब में धुत बेटे ने भी बहू का ही साथ दिया । दादी ने कुएं पर झोपडी डाल कर उसमे रही और दूसरों से मदद लेकर उन बच्चों को पाला एक दिन दादी ने अपने बेटे के खेत से थोड़ा अपनी गाय के लिए चारा लेने  लगी  तो बेटे ने अपनी माँ को ही खेत से धक्का देकर निकाल दिया । ये सब उस का पोता  देख रहा था। धीरे धीरे बच्चे बड़े हुए दोनों ही बहुत महंती और समझदार थे ।  वो पढ़ लिखकर कामयाब हो गए । और उनकी शादी अच्छे घरों की पढ़ी लिखी लड़कियो  से हो गई । उधर बुढ़िया के बेटे के और एक बेटा और एक बेटी  हो गई। घर का सही माहौल न मिलने  और सही संस्कारो के  न  मिलने की वजह से वो बिगड़ गया । बुढ़िया के दोनों पाले  हुए पोते दिन पर दिन तरक्की करते गए और उधर वो  घर को बर्बाद करता  गया  । अब लड़की की शादी करने का वक्त आया अगर लड़की के पिता की हैसियत देखी जाए तो लड़की को किसी गरीब घर में ही शादी कर दी जाए, और अगर बड़े भाइयों को देखा जाए तो शादी समाज के अनुसार की जाए । बड़े भाइयों ने उस लड़की की शादी अपनी हैसियत से भी ऊपर होकर धूम धाम से शादी की । और जरूरत पड़ने पर समय समय पर अपने पिता और माँ की मदद भी की । लेकिन उस  छोटे बिगड़े भाई  ने इस बात का भी नाजायज फायदा उठाया पिता के बहाने बड़े भाइयों को लाखों का चुना ही लगाया । अब ये बात जब बड़े भाइयो की समझ में आने लगा तो वो धीरे धीरे पीछे हटने लगे । उधर पिता पूरी तरह से बर्बाद हो चूका था । और जब कुछ भी उसके पास ना रहा तो बुढ़ापे मे उसके बेटे और पत्नी ने उसे घर से निकाल दिया । जब ये बात बड़े बेटे को पता चली तो वह अपने घर ले आया । पिता रहता तो यहां लेकिन उसका मन अपने छोटे बेटे और  पत्नी मे ही अधिक था। उसे अपने बड़े बेटो की शराफत नजर नहीं आई वह सिर्फ ये सोचता मैने इन्हे जन्म दिया मेरा करना इनका फर्ज है। और वह भी लालच मे अपने बड़े  बच्चों  से ले जा जाकर उन्हें देने  लगा बडा  बेटा  भी बहुत धैर्यवान और सामाजिक इंसान था। अपने पिताजी की ख़ुशी के लिए देता रहा । अब  वो और भी बुड्ढा हो गया । और  बीमारी भी ऐसी लग गई की उसमे बदबू आने लगी । अब बूढ़े की पत्नी और बेटा लालच से भी उसकी नहीं कर  सकते थे । ऐसे में फिर बूढ़े को बड़े बेटे को लाना पड़ा । अब बेटे की पत्नी और छोटा भाई सेवा करे तो कैसे करे ? पहले तो इतनी बदबू दूसरे पुरे जन्म की उसका गलत व्यवहार तीसरे अब भी  बुढ्ढे का लगाव बुढ़िया और वो बिगड़े बेटे अब क्या करें ?  जैसे तैसे आखिर तक बड़े बेटे बहु ने किया लेकिन छोटा बेटा और बड़ी बहू दिल से उसकी इज्जत ना कर  पाए कही ना कही एक फर्ज और जिम्मेदारी ही सोच कर ये कार्य किया ।    

दोस्तों आपने इस कहानी से क्या प्रेरणा ली ? 

मैने जो इसमें से उठाया उसे में बताती हुं - आप आज जो भी गलत व्यवहार किसी के साथ कर रहे हो, वो आपके साथ जरूर होगा । अच्छा आपके साथ  ना हो गलत जरूर होगा ।  कहते है ना की अच्छाई चार कदम साथ चलती है और बुराई  सात पीढ़ी । दूसरे जो आप अपने बच्चों से  अपने लिए व्यवहार चाहते हो वह पहले खुद अपने अभिभावकों के साथ करो बच्चे जो देखते हैं वो सीखते हैं । इसलिए अगर आपने अपनी जिंदगी में गलती की हैं और अब आप की जो थोड़ी बहुत सेवा हो रही है तो उसे भगवान का आशीर्वाद मानकर भगवान का शुक्रिया अदा करो । अपने बुढ़ापे को और ना बिगाडे । और दूसरे जो बच्चों के लिए इससे सिख मिलती है वो ये है कि जो गलती आप के अभिभवकों ने कि वो आप मत करो क्यों की आप के बच्चे आप से सीखेंगे और जो आज आप अपने  अभिभवकोंके साथ कर  रहे हो कल आपके बच्चे आपके साथ करेंगे और चक्र युही घूमता रहेगा । और कहते है ना लोग आपकी हजार अच्छाइयों को भूल जाएंगे लेकिन अगर आप ने  जिंदगी मे एक बुराई की है तो उसे याद रखेंगे। इसलिए आपके साथ में चाहे किसी ने कैसा भी व्यवहार किया हो आप हमेशा अच्छा ही करो, कभी भी खुद को  अच्छाई करने से ना रोकें फिर आपकी चाहे सरहाना हो या ना हो बेशक कुछ नुकसान क्यों न उठाना पड़े लेकिन समाज और अपने बच्चों पॉजिटिव मैसेज देने के लिए अच्छाई ही करें ।  अग्रवाल मूवर्स ग्रुप के चेयरमैन ,श्री रमेश अग्रवाल जी ने भी कहा है कि-
" जो व्यक्ति अपने मत पिता का सम्मान नहीं कर  सकता वह कभी सफलता के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता । माता पिता व बड़ो का आशीर्वाद हमारे मानसिक व शारीरिक विकास के लिए जरूरी है । यदि आप चाहते हैं की आपके बच्चे आखरी समय मे आपकी सेवा करें तो ये आप का कर्तव्य है की आप भी अपने माता पिता की सेवा कर आदर्श उपस्तिथ करें "  


Sunday, July 3, 2016

वॉट्सऐप की लत !!!

                                    

मै मेरठ आई हुई थी, मेरे फोन मे  नेट नही चल रहा था । अभी घर पहुंचने मे समय लगना था। मुझे अजीब सी बेचैनी हो रही थी ,मेरा हाथ बार बार वॉट्सऐप पर जा रहा था। नेट ना चलने की वजह से  वॉट्सऐप व  नेट  ना चलने की कमी मुझे खल रही थी। ऐसा नही था कि मुझे उसमे किसी जरूरी जानकारी या मेसिज का इंतजार था , बल्कि वॉट्सऐप और नेट के बिना अपने अापको अधूरा महसूस कर रही थी । तभी एक गहरा झटका लगा जैसे की में  गहरी नींद से जागी हूँ । मेरे अंतर्मन से आवाज आई कि ये क्या हाल बना लिया है ? थोड़ी थोड़ी देर मे वॉट्सऐप देखने का कैसा फितूर चढ़ा हुआ है ?  दूसरों से जुडे रहने की ये कैसी सनक है ?  वो भी ऐसी की में फोन के बिना कुछ घंटे नही रह सकती ? इससे मेरा जीवन कितना डिस्टर्ब हो रहा है ? में किसी भी काम पर फोकस नहीं कर पा रही हुं ? और तब मुझे अहसास हुआ की जाने अनजाने मुझे इसकी ' लत ' लग गई है । "सोशल मिडिया गैजेट" की लत। किसी ने सही कहा है पहले उठते ही लोग अपने हाथ देखते थे, और प्रार्थना करते  थे -  

" कराग्रे वसते लक्ष्मिः करमध्ये सरस्वति । करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम "

 अब वट्सऐप  देखते हैं और  प्रार्थना करते  हैं -

 " कराग्रे वसति  फोनम : करमध्ये वटसेपम। करमूले च फेसबुकम : प्रभाते करदर्शनम " 

पहले प्रार्थना करते थे - इतनी शक्ति हमे देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना, हम चलें  नेक रस्ते पर  हमसे भूलकर भी भूल हो ना । और अब प्रार्थना करते हैं -  

३ जी शक्ति हमे देना दाता, फोन का सिगनल कमजोर हो ना, हम रहे रेंज मे हर कदम पर, भूलकर भी हम ऑफ़ लाइन हो ना "  

पांच छः साल पहले तक मेरे फोन मे नेट नही था , फिर भी मै  सब के साथ गहराई से जुडी हुई थी । सब के पास जाकर मिलते थे खास ओकेशन मनाते, सुख दुःख बांटते और कही नही पहुंच पाते तो फोन करके शुभकामनाएं देते । लेकिन अब बहुत सारे लोगो के संपर्क मे होते हुए भी उनसे घनिष्टता बढ़ने की बजाए कम हो गई  है । रिस्तो मे फॉर्मेल्टी ज्यादा निभाने लगे  हैं, एक इमेज या एक वीडियो भेजकर फार्मेल्टी पूरी कर देते हैं। अगर साल छ: महीने मे  कभी  किसी से मिलते भी हैं तो दस पंद्रह  मिनट में ही अपना फोन देखने लगते हैं और तब ध्यान हटता है जब सामने वाला कहता है की क्या देखने लगे। आश्चर्य की बात तो ये है कि अभिभावक व बच्चे साथ रहते हुए भी साथ नही रहते । बच्चे अपने फोन मे लगे रहते हैं और अभिभावक अपने फोनो मे व्यस्त मिलेंगे । 

जब मैने इसके के बारे मे सोचा तो मुझे अहसास हुआ की पहले मे दुनियां भर की जानकारी कम रखती थी लेकिन मेरे अंदर कूड़ा कर्कट नही था। अब जानकारियो के साथ साथ मैरे दिमाग मे कूड़ा कर्कट भी जमा होने लगा है। मै अपने दिमाग में ऐसी जानकारी और विचारों के कूड़े को भरने  लगी हूं  जिनकी मुझे वास्तव मे कोई जरूरत नही है । 


उस दिन मुझे अहसास हुआ कि मै कितना कीमती समय इस पर बर्बाद कर रही हुं - और मै  ही क्या दुनिया भर मे स्मार्ट फोन को लेकर लोगो मे कितनी दीवानगी है इसका हाल ही  मे उधारण तब देखने को मिला जब इसे लेकर कुछ उदहारण सामने आएं । 

" जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ़  वुथवर्क और  ' नॉटिंगम ' यूनिवर्सिटी ने अपनी स्टेडी मे बताया है कि  पुरुष २० सेकंड  और महिलाएं 57 सेकिंड  से ज्यादा स्मार्ट फोन से  दूर नही रह पाते " 

"औसतन स्मार्ट फोन रखने वाले महिलाएं व पुरुष  ४४ सैकिंड से  ज्यादा देर तक  फोन से दूर नही रह पाते "

अब में समझ चुकी हूं कि मै अपना क़ीमती समय इन चीजों में नष्ट कर रही हूँ । इसलिए मैने ये निर्णय लिया है कि अब मे पुरे दिन मे सिर्फ तीन बार ही वॉट्सऐप देखुगी और सिर्फ दस दस मिनट ही वॉट्सऐप पर दूगी । जो एक्स्ट्रा समूह है उनसे दूर रहुगी। महत्वपूर्ण संदेशों तक ही सिमित रहुगी और गूगल भी जरूरत के अनुसार ही यूज करुँगी ।   

आज हम लोगो को  वट्सऐप व फेसबुक के माध्यम से आत्मीय लोगो का साथ व ज्ञान मिल रहा है । वॉट्सऐप ग्रुप से हम लोग ना केवल चुटकले वीडियों और आडियों शेयर करते हैं बल्कि आध्यात्मिक व गहन संदेश भी भेजते हैं , अपने अनुभव बांटते  हैं । और जरूरत पड़ने पर मॉरल स्पोट भी करते हैं । और दूसरा इसका महत्वपूर्ण लाभ ये है कि  यह समान रुझान वाले लोगो को जोड़ता है । वट्सऐप की वजह से एक दूसरे के बेहद करीब आ गये हैं। लेकिन इसकी लत आपको बुरी तरह से बंधक बना सकती है "गैजेट्स सोशल मिडिया"  एक बहुत अच्छ वरदान है लेकिन तभी तक जब तक जब तक आप इसमे आसक्त ना हो। आपकी आसक्ति वरदान को शाप बना सकती है ।